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अज़ीज़ वारसी

1924 - 1989 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 38

शेर 13

दिल में अब कुछ भी नहीं उन की मोहब्बत के सिवा

सब फ़साने हैं हक़ीक़त में हक़ीक़त के सिवा

कैसे मुमकिन है कि हम दोनों बिछड़ जाएँगे

इतनी गहराई से हर बात को सोचा करो

तुम्हारी ज़ात से मंसूब है दीवानगी मेरी

तुम्हीं से अब मिरी दीवानगी देखी नहीं जाती

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पुस्तकें 11

Azeez Warsi

 

 

गज़लियात-ए-अज़ीज़

 

2000

Hadees-e-Maarifat

 

1967

जहान-ए-अज़ीज़

अज़ीज़ वारसी

2005

जसारत

 

1976

कुल्लियात-ए-अज़ीज़

 

1993

मेहराब

 

1976

Safeena-o-Sahil

 

1951

Safeena-o-Sahil

 

1962

Safeena-o-Sahil

 

1962

ऑडियो 7

उस ने मिरे मरने के लिए आज दुआ की

ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ

जहाँ में हम जिसे भी प्यार के क़ाबिल समझते हैं

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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