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बिस्मिल सईदी

1902 - 1977 | टोंक, भारत

क्लासिकी अंदाज़ के प्रमुख शायर / सीमाब अकबरकबादी के शागिर्द

क्लासिकी अंदाज़ के प्रमुख शायर / सीमाब अकबरकबादी के शागिर्द

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हम ने काँटों को भी नरमी से छुआ है अक्सर

लोग बेदर्द हैं फूलों को मसल देते हैं

किया तबाह तो दिल्ली ने भी बहुत 'बिस्मिल'

मगर ख़ुदा की क़सम लखनऊ ने लूट लिया

सर जिस पे झुक जाए उसे दर नहीं कहते

हर दर पे जो झुक जाए उसे सर नहीं कहते

ख़ुश्बू को फैलने का बहुत शौक़ है मगर

मुमकिन नहीं हवाओं से रिश्ता किए बग़ैर

tho fragrance is very fond, to spread around, increase

this is nigh impossible, till it befriends the breeze

tho fragrance is very fond, to spread around, increase

this is nigh impossible, till it befriends the breeze

अधर उधर मिरी आँखें तुझे पुकारती हैं

मिरी निगाह नहीं है ज़बान है गोया

हुस्न भी कम्बख़्त कब ख़ाली है सोज़-ए-इश्क़ से

शम्अ भी तो रात भर जलती है परवाने के साथ

when is poor beauty saved from the

along with the moths all night the flame did surely burn

when is poor beauty saved from the

along with the moths all night the flame did surely burn

ठोकर किसी पत्थर से अगर खाई है मैं ने

मंज़िल का निशाँ भी उसी पत्थर से मिला है

ना-उमीदी है बुरी चीज़ मगर

एक तस्कीन सी हो जाती है

काबे में मुसलमान को कह देते हैं काफ़िर

बुत-ख़ाने में काफ़िर को भी काफ़र नहीं कहते

तुम जब आते हो तो जाने के लिए आते हो

अब जो कर तुम्हें जाना हो तो आना भी नहीं

किसी के सितम इस क़दर याद आए

ज़बाँ थक गई मेहरबाँ कहते कहते

सुकूँ नसीब हुआ हो कभी जो तेरे बग़ैर

ख़ुदा करे कि मुझे तू कभी नसीब हो

मेरे दिल को भी पड़ा रहने दो

चीज़ रक्खी हुई काम आती है

दो दिन में हो गया है ये आलम कि जिस तरह

तेरे ही इख़्तियार में हैं उम्र भर से हम

मोहब्बत में ख़ुदा जाने हुईं रुस्वाइयाँ किस से

मैं उन का नाम लेता हूँ वो मेरा नाम लेते हैं

दोहराई जा सकेगी अब दास्तान-ए-इश्क़

कुछ वो कहीं से भूल गए हैं कहीं से हम

रो रहा हूँ आज मैं सारे जहाँ के सामने

रोएगा कल देखना सारा जहाँ मेरे लिए

ज़माना-साज़ियों से मैं हमेशा दूर रहता हैं

मुझे हर शख़्स के दिल में उतर जाना नहीं आता

इश्क़ भी है किस क़दर बर-ख़ुद-ग़लत

उन की बज़्म-ए-नाज़ और ख़ुद्दारियाँ