शेर 5

हर शब-ए-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी है मगर

सब की ताबिंदा सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं

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सफ़र की आख़िरी मंज़िल में पास आया है

तमाम उम्र था जो दूर आसमाँ की तरह

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मैं ख़स्ता-हाल होता ये अजनबी से लगते

ये हसीं हसीं फ़रिश्ते मुझे आदमी से लगते

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सरहद-ए-दश्त से आबादी को जाने वालो

शहर में और भी ख़ूँ-रेज़ नज़ारे होंगे

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शब की तन्हाई में उभरी हुई आवाज़-ए-जरस

सुब्ह-गाई का गजर हो ये ज़रूरी तो नहीं

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क़ितआ 3

 

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