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सूफ़ी तबस्सुम

1899 - 1978 | लाहौर, पाकिस्तान

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इस आलम-ए-वीराँ में क्या अंजुमन-आराई

दो रोज़ की महफ़िल है इक उम्र की तन्हाई

दिलों का ज़िक्र ही क्या है मिलें मिलें मिलें

नज़र मिलाओ नज़र से नज़र की बात करो

देखे हैं बहुत हम ने हंगामे मोहब्बत के

आग़ाज़ भी रुस्वाई अंजाम भी रुस्वाई

आज 'तबस्सुम' सब के लब पर

अफ़्साने हैं मेरे तेरे

ऐसा हो ये दर्द बने दर्द-ए-ला-दवा

ऐसा हो कि तुम भी मुदावा कर सको

it should not be that this ache intensifies past remedy

it should not happen even you do not have a cure for me

it should not be that this ache intensifies past remedy

it should not happen even you do not have a cure for me

कितनी फ़रियादें लबों पर रुक गईं

कितने अश्क आहों में ढल कर रह गए

जब भी दो आँसू निकल कर रह गए

दर्द के उनवाँ बदल कर रह गए

खुल के रोने की तमन्ना थी हमें

एक दो आँसू निकल कर रह गए

औरों की मोहब्बत के दोहराए हैं अफ़्साने

बात अपनी मोहब्बत की होंटों पे नहीं आई

जाने किस की थी ख़ता याद नहीं

हम हुए कैसे जुदा याद नहीं

कौन किस का ग़म खाए कौन किस को बहलाए

तेरी बे-कसी तन्हा मैरी बेबसी तन्हा

इक फ़क़त याद है जाना उन का

और कुछ इस के सिवा याद नहीं

हुस्न का दामन फिर भी ख़ाली

इश्क़ ने लाखों अश्क बिखेरे

रोज़ दोहराते थे अफ़्साना-ए-दिल

किस तरह भूल गया याद नहीं

मिलते गए हैं मोड़ नए हर मक़ाम पर

बढ़ती गई है दूरियाँ मंज़िल जगह जगह

मैं तोहफ़ा ले के आया हूँ तमन्नाओं के फूलों का

लुटाने को बहार-ए-ज़िंदगानी ले के आया हूँ

एक शोला सा उठा था दिल में

जाने किस की थी सदा याद नहीं