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तअशशुक़ लखनवी

1824 - 1892

तअशशुक़ लखनवी

ग़ज़ल 13

अशआर 28

मैं बाग़ में हूँ तालिब-ए-दीदार किसी का

गुल पर है नज़र ध्यान में रुख़्सार किसी का

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हम किस को दिखाते शब-ए-फ़ुर्क़त की उदासी

सब ख़्वाब में थे रात को बेदार हमीं थे

जिस तरफ़ बैठते थे वस्ल में आप

उसी पहलू में दर्द रहता है

वो खड़े कहते हैं मेरी लाश पर

हम तो सुनते थे कि नींद आती नहीं

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कभी तो शहीदों की क़ब्रों पे आओ

ये सब घर तुम्हारे बसाए हुए हैं

पुस्तकें 12

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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