कामचोर

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    “बेगम अब हमारी पेंशन होने वाली है, ज़रा घर का ख़र्च कम करो।”

    हमारे अब्बा मियाँ ने पेंशन से पहले ये मुनासिब समझा कि हमारी अम्माँ-जान को (जो हमारे अब्बा मियाँ से भी ज़्यादा खुले हाथ की थीं) ऊँच-नीच समझा दें।

    “ऐ है! मैं ज़्यादा ख़र्च करती हूँ तो अपने हाथ में घर का इंतिज़ाम ले लो।” अम्मा जान बिगड़ीं।

    “यानी कि मैं कमाऊँ भी और घर की देख-भाल भी करूँ? ख़ूब, बहुत ख़ूब! फिर बीवी का फ़ायदा क्या है? आख़िर तुम किस मर्ज़ की दवा हो?”

    “भई हम तो फूहड़ हैं। तुम कोई सुघड़ ब्याह कर ले आते।” अम्माँ ने ताना दिया...

    ज़ाहिर है, अब्बा मियाँ इस वक़्त तो कोई सुघड़ बीवी ब्याह कर ला नहीं सकते थे, क्योंकि वो उस वक़्त कल्ब से टेनिस खेल कर हारे थके आए थे। वो बहस नहीं करना चाहते थे, इसलिए वो भी क़ाइल हो गए। इस शोर और हंगामे को सुनकर हम लोग भी आस-पास जमा हो गए थे। एक दम भीड़ से अम्माँ का दम बौखला उठा और वो चारों तरफ़ थप्पड़ चाटे और चपत बांटने लगीं... “ग़ारत हो कम-बख़्तो! कलेजे पर चढ़े चले आते हैं।”

    अब्बा मियाँ का ग़ुस्सा वो हम लोगों पर उतारने लगीं। हम लोग उदास हो कर उनसे ज़रा दूर हट आए और दिल में दुआएँ माँगने लगे, काश अब्बा मियाँ हमारे लिए एक फ़र्स्ट क्लास सी अम्माँ ले आएँ ताकि आए दिन के झगड़े से कुछ तो मोहलत मिले और सुख का साँस आए। ख़ैर, अब्बा मियाँ नई अम्माँ-जान तो लाए। लेकिन हमारी पुरानी अम्माँ को उन्होंने इस बात पर ज़रूर राज़ी कर लिया कि वो ख़र्च कम करने की स्कीम पर ग़ौर करने को तैयार हों। इस सिलसिले में अब्बा ने तजवीज़ पेश की।

    “सब नौकर निकाल दो, ये दो बावर्ची क्यों हैं?”

    “है है... इतने आदमियों का खाना एक बावर्ची से नहीं पकेगा। आप ही ने तो कहा था। अकेले बावर्ची से इतने आदमियों का खाना पकवाना जुर्म है... ज़बरदस्ती दूसरा बावर्ची रखवाया था।”

    “ख़ैर, छोड़ो बावर्ची को... ये बताओ, ये औरतें कौन-कौन सी भर ली हैं?” अब्बा मियाँ ने पूछा…

    “ऐ है... नई तो कोई नहीं, वही औरतें हैं, जो शुरू से थीं।” अम्माँ-जान ने वज़ाहत की...

    “आख़िर कौन हैं? और ये बच्चे किस-किस के भर रखे हैं? निकालो इनको, कहो अपने घर जाकर खेलें।”

    “लो और सुनो, अरे ये सब अपने बच्चे हैं।”

    “ये सब?” अब्बा मियाँ काँप उठे…

    “ऐ वाह क्या नादान बनते हो!”

    “यानी तुम्हारा मतलब है बेगम कि ये… ये सब के सब हमारे-तुम्हारे यानी कि बिलकुल हमारे बच्चे हैं?” अब्बा मियाँ हैरान होते हुए बोले…

    “ऐ है तौबा है! आप तो बात को फ़ौरन पकड़ लेते हैं… और ये तो अकबरी के बच्चे हैं।”

    “तुम्हारी भाँजी!”

    “हूँ... और तुम्हारी भतीजी!” अम्माँ ने बताया...

    बड़ी देर की हुज्जत के बाद ये तय हुआ कि सच-मुच नौकरों को निकाल दिया जाये। आख़िर ये मोटे-मोटे बच्चे किस काम के हैं... हिल कर पानी नहीं पीते। इन्हें अपना काम ख़ुद करने की आदत होनी चाहिए। काम-चोर कहीं के।

    “तुम लोग कोई काम नहीं करते, इतने सारे हो और सारा दिन ऊधम मचाने के सिवा कुछ नहीं करते।”

    और सच-मुच हमें ख़्याल आया कि हम आख़िर-ए-कार कोई काम क्यों नहीं करते? हिल कर पानी पीने में अपना क्या ख़र्च होता है। इसलिए हमने फ़ौरन हिल-हिल कर पानी पीना शुरू किया। हिलने में धक्के भी लग जाते हैं और हम किसी के दबैल तो थे नहीं कि कोई धक्का दे तो सह जाएँ। लीजिए पानी के मटकों के पास ही घमसान का रन पड़ गया। सुराहियाँ इधर को लुढ़कें, मटके उधर गए, कपड़े शराबोर सो अलग।

    “ये लीजिए, करा लें काम। ये भला काम करेंगे, गधे कहीं के। दोनों सुराहियाँ तोड़ दीं।” अम्माँ ने फ़ैसला किया...

    “करेंगे कैसे नहीं, इनके तो बाप भी काम करेंगे। देखो जी जो काम नहीं करेगा, उसे रात का खाना हरगिज़ नहीं मिलेगा, समझे!”

    ये लीजिए, बिलकुल शाही फ़रमान जारी हो रहे हैं…

    “हम काम करने के लिए तैयार हैं। हमें काम बताया जाये।” हमने दुहाई दी...

    “बहुत से काम हैं, जो तुम कर सकते हो। मसलन ये दरी को देखो कितनी मैली हो रही है। आँगन में जाकर देखो कितना कूड़ा पड़ा है। सहन में पेड़ हैं उनको पानी देना है और हाँ भई, याद रहे मुफ़्त तो ये काम करवाए

    नहीं जाऐंगे। तुम सबको तनख़्वाह भी मिलेगी।”

    अब्बा मियाँ ने तफ़सील बताई और दूसरे कामों का हवाला दिया... “माली को तनख़्वाह मिलती है। अगर सब बच्चे मिलकर पानी डालें तो…”

    “ए है ख़ुदा के लिए नहीं, ऐसा ग़ज़ब करना। घर में सैलाब जाएगा।”

    अम्माँ-जान ने इल्तिजा की। फिर तनख़्वाह के ख़्वाब देखते हुए हम लोग काम पर तुल गए।

    एक दिन फ़र्शी दरी पर बहुत से बच्चे जुट गए और चारों तरफ़ से दरी के कोने पकड़ लिए और फिर कमरे के अंदर ही उसे झटकना शुरू कर दिया। दो-चार ने तो लकड़ियाँ लेकर धुआँ धुआँ पिटाई शुरू कर दी।

    “ऐ ख़ुदा की मार! झाड़ू फिरे तुम्हारी सूरतों पर, अरे कमबख़्तो ये क्या कर रहे हो...”

    सारा घर धूल से अट गया। खाँसते-खाँसते सब बे-दम हो गए। सारी गर्द जो दरी पर थी वो और जो कुछ फ़र्श पर थी वो सब के सरों पर जम गई। नाकों और आँखों में घुस गई, जिसकी वजह से बुरा हाल हो गया सब का। मार-मार कर हम लोगों को आँगन में निकाला गया। वहाँ हम लोगों ने झाड़ू देने का फ़ैसला किया।

    झाड़ू चूँकि एक थी और तनख़्वाह लेने के उम्मीदवार बहुत। इसलिए दम-भर में झाड़ू के पुर्ज़े उड़ गए। जितनी सींकें जिसके हाथ पड़ीं, वो उनसे ही उल्टे सीधे हाथ मारने लगा। ज़मीन कम और एक दूसरे की नंगी टाँगें ज़्यादा झाड़ी गईं। नतीजा ये हुआ कि सींकें चलीं, आँखें फूटते-फूटते बचीं।

    अम्माँ ने ये सब देख कर अपना सर पीट लिया।

    भई ये बुज़ुर्ग हमें काम करने दें तो हम काम करें। जब ज़रा-ज़रा सी बात पर हम पर थप्पड़ों की बारिश होने लगे तो बस हो चुका काम।

    अस्ल में झाड़ू देने से पहले ज़रा सा पानी छिड़क लेना चाहिए ताकि गर्द वग़ैरा बैठ जाये। बस हमारे ज़ह्न में ये ख़्याल आते ही फ़ौरन दरी पर पानी छिड़का गया। एक तो वैसे ही गर्द में अटी हुई थी। उसके ऊपर पानी पड़ते ही सारी गर्द कीचड़ बन गई।

    अब तो हम सब सहन से भी मार-मार कर निकाले गए। तय हुआ कि पेड़ों में पानी दिया जाये। बस सारे घर की बालटियाँ, लोटे, तसले, भगोने, पतीलियाँ, लूट ली गईं। जिन्हें ये चीज़ें भी मिलीं, वो डोंगे और कटोरे गिलास ही ले भागे।

    अब सब लोग नल पर टूट पड़े। यहाँ पर भी वो घमासान मची कि क्या मजाल जो एक बूँद पानी भी किसी के बर्तन में सका हो। ठूसम-ठास किसी बाल्टी पर पतीला, और पतीले पर लोटा और भगोने और डोंगे। पहले तो धक्के चले, फिर कोहनियाँ और उसके बाद बर्तनों ही से एक दूसरे पर हमला कर दिया गया। ज़ाहिर है कि भारी बर्तनों वाले तो हथियार उठाते ही रह गए। कटोरों और डोंगों से लैस फ़ौज ने वो मारके मारे कि सरों पर गोमड़े डाल दिए।

    फ़ौरन बड़े भाईयों, बहनों, मामुओं, चचाओं और दमदार ख़ालाओं और फूफियों की एक ज़बरदस्त कुमक भेजी गई। जिन्होंने इतना ज़बरदस्त हमला किया कि ख़ुदा की पनाह... फ़ौज ने आते ही अपनी पतली-पतली नीम की छड़ियों से हमारी नंगी टाँगों और बदन पर वो सड़ाके लगाए कि डोंगा और कटोरा फ़ौज मैदान में हथियार फेंक कर पीठ दिखा गई।

    इस ज़बरदस्त धींगा-मस्ती में कुछ बच्चे इस बुरी तरह से कीचड़ में लत-पत हो गए थे कि उन्हें पहचानना मुश्किल हो गया था। इन बच्चों को नहला कर कपड़े बदलवाने के लिए नौकरों की मौजूदा तादाद नाकाफ़ी थी, इसलिए पास पड़ोस के बंगलों और कोठियों से नौकर बुलवाए गए और चार आने फ़ी बच्चा के हिसाब से उनसे नहलवाए गए।

    हम लोग क़ाइल हो गए कि सच-मुच ये सफ़ाई वग़ैरा के काम अपने बस की बात नहीं और ही इन पेड़ों की देख-भाल हमसे हो सकती है। इसलिए मुर्ग़ियाँ ही बंद कर दें। बस शाम ही से ये काम शुरू कर दिया।

    लिहाज़ा जो बाँस, छड़ी हाथ पड़ी, ले-ले कर मुर्ग़ियाँ हाँकने लगे “चल डरबे, चल डरबे।”

    मगर साहब शायद उन मुर्ग़ियों को भी किसी ने हमारे ख़िलाफ़ भड़का रखा था। ऊटपटाँग इधर-उधर कूदने लगीं। दो मुर्ग़ियाँ खीर के पियालों से, जिन पर आपा चाँदी के वर्क़ लगा रही थी, दौड़ती फड़फड़ाती निकल गईं। तूफ़ान गुज़रने के बाद मा’लूम हुआ कि प्याले ख़ाली हैं और सारी खीर आपा के कामदानी के दुपट्टे और ताज़े धुले सर पर।

    एक बड़ा सा मुर्ग़ा अम्माँ के खुले हुए पानदान में फाँद पड़ा और कत्थे चूने में लिथड़े हुए पंजे लेकर नानी अम्माँ की सफ़ेद दूध ऐसी चाँदनी पर मारता हुआ निकल गया। पानदान उलट कर नीचे रहा।

    एक मुर्ग़ी दाल की पतीली में छपाका मार कर भागी और सीधी जाकर मोरी में इस तेज़ी से फिसली कि सारी कीचड़ ख़ाला जी के मुँह पर जा पड़ी जो वहाँ पर बैठी हाथ-मुँह धो रही थीं। उधर तमाम मुर्ग़ियाँ बे-नकेल का ऊँट बनी दौड़ती फिर रही थीं और कोशिश के बावजूद एक भी मुर्ग़ी डरबे में जाने के लिए राज़ी थी।

    इधर किसी को ये सूझी की बक़रईद के लिए जो भेड़ें घर में आई हुई हैं वो ज़रूर भूकी होंगी। चलो लगे हाथों उन्हें भी दाना खिला दिया जाये। दिन-भर की भूकी भेड़ें दाने का सूप देख कर जो सब की सब झपटीं तो भाग कर अपना आप बचाना मुश्किल हो गया। लश्तम-पश्तम तख़्तों पर चढ़ गए। पर भेड़चाल मशहूर है। उनकी नज़रें तो बस दाने के सूप पर जमी हुई थीं। पलंगों को फलाँगती, बर्तन लुढ़काती साथ-साथ गईं।

    तख़्त पर बानो आपा के जहेज़ का दुपट्टा फैला हुआ था, जिस पर गोखरू, चम्पा और सलमा सितारे उलझाती, जॉर्जजट के दुपट्टे रौंदती, मैंगनों का छिड़काओ करती दौड़ गईं।

    जब तूफ़ान गुज़र चुका तो ऐसा मा’लूम हुआ जैसे जर्मनी की फ़ौज टैंकों और बमबारों समेत इधर से छापा मार कर गुज़र गई हो। जहाँ-जहाँ से सूप गुज़रा, भेड़ें शिकारी कुत्तों की तरह बू सूँघती हमला करती गईं।

    हज्जन माँ एक तरफ़ पलंग पर दुपट्टे से अपना मुँह ढाँके गहरी नींद सो रही थीं। उन पर से जो भेड़ें दौड़ीं तो जाने वो ख़्वाब में किन महलों की सैर कर रही थीं। दुपट्टे में उलझी हुई “मारो... मारो... पकड़ो... पकड़ो...” चीख़ने लगीं।

    इतने में भेड़ें सूप को भूल कर तरकारी बेचने वाली की टोकरी पर टूट पड़ीं। वो दालान में बैठी मुड़ की फलियाँ तौल-तौल कर बावर्ची को दे रही थी। वो अपनी तरकारी का बचाओ करने के लिए सीना तान कर उठ खड़ी हुई। आपने कभी भेड़ों को मारा होगा, तो ये बात अच्छी तरह जानते होंगे और आपने देखा भी होगा कि बस ऐसा लगता है जैसे रूई के तकिए को कूट रहे हैं। भीड़ के चोट ही नहीं लगती। बिलकुल ये समझ कर कि आप इससे मज़ाक़ और लाड कर रहे हैं, वो आप ही पर चढ़ बैठेगी।

    ज़रा सी देर में भेड़ों ने तरकारी छिलकों समेत अपने पेट की कढ़ाई में झोंक दी। इधर क़यामत मची थी, उधर दूसरे कारिंदे भी ग़ाफ़िल नहीं थे। इतनी बड़ी फ़ौज थी, जिसे रात का खाना मिलने की धमकी मिल चुकी थी।

    चार कारिंदे जल्दी-जल्दी एक भैंस का दूध दूहने पर जुट गए। धुली बे-धुली बाल्टी लेकर आठ हाथ जब चार थनों पर अचानक पिल पड़े, तो भैंस एक दम से जैसे चारों पैर जोड़ कर उठी और बाल्टी को ज़ोर से लात मार कर दूर जा खड़ी हुई।

    चारों कारिंदों ने आपस में सलाह मश्वरा किया और तय ये पाया कि भैंस की अगाड़ी-पिछाड़ी बाँध दी जाये और फिर क़ाबू में लाकर दूध दूह लिया जाए। बस फ़ौरन ही झूले की रस्सी उतार कर भैंस के पैर बाँध दिए। भैंस के पिछले दोनों पैर चचा मियाँ की चारपाई के पाइयों से बाँधे और अगले दोनों पैरों को बाँधने की कोशिश जारी थी कि भैंस एक दम चौकन्नी हो गई। छूट कर जो भागी है तो पहले चचा मियाँ समझे कि शायद कोई ख़्वाब देख रहे हैं। फिर जब चारपाई पानी के ड्रम से टकराई और पानी छलक कर उनके ऊपर गिरा तो वो समझे कि आँधी और तूफ़ान में फंसे हैं। साथ में भूंचाल भी आया हुआ है। फिर जल्दी ही उन्हें असली हालात का पता चल गया, और वो पलंग की दोनों पट्टियाँ पकड़े और उनको साँड की तरह छोड़ देने वालों को बुरा-भला सुनाने लगे।

    यहाँ इस मंज़र का बड़ा मज़ा रहा था। भैंस दौड़ी चली जा रही थी और पीछे-पीछे चारपाई, और उस पर बिलकुल राजा इंद्र की तरह बैठे हुए चचा मियाँ।

    ओहो, एक भूल ही होगी। यानी बछड़ा तो खोला ही नहीं। इसलिए फ़ौरन बछड़ा खोल दिया गया। तीर निशाने पर बैठा और बछड़े की ममता मैं बे-क़रार हो कर भैंस ने अपने खुरों को ब्रेक लगा लिए। बछड़ा फ़ौरन जुट गया। दूहने वाले फ़ौरन गिलास कटोरे लेकर लपके, क्योंकि बाल्टी तो छपाक से गोबर में जा गरी थी। एक बछड़ा और चार बच्चे, भैंस फिर बाग़ी हो गई। कुछ दूध ज़मीन पर और कपड़ों पर, दो-चार धारें गिलास कटोरों में भी पड़ गईं। बाक़ी दूध बछड़ा पी गया। ये सब कुछ एक मिनट के तीन चौथाई में हो गया। घर में तूफ़ान उठ खड़ा हुआ। ऐसा लगता था जैसे सारे घर में मुर्ग़ियाँ, भेड़ें, टूटे हुए तसले, बालटियाँ, लूटे, कटोरे और बच्चे बिखरे पड़े थे।

    अम्माँ-जान ने अपना सर पीट लिया। आपा जान चौखट पर बैठ कर रोने लगीं। बड़ी मुश्किल से अम्न क़ायम कर के भेड़ें, भैंस, और बच्चे बाहर किए गए। मुर्ग़ियाँ बाग़ में हंकाई गईं। मातम करती हुई तरकारी वाली के आँसू पोंछे गए और अम्माँ-जान आगरे जाने के लिए सामान बाँधने लगीं।

    “या तो बच्चा राज क़ायम कर लो, या मुझे ही रख लो। वर्ना मैं तो चली मैके।” अम्माँ ने अल्टीमेटम दे दिया।

    “मुए बच्चे हैं, कि लुटेरे...” और अब्बा ने सबको क़तार में खड़ा कर के पूरी बटालियन का कोर्ट मार्शल कर दिया... “गर किसी बच्चे ने घर की किसी चीज़ को भी हाथ लगाया, तो बस रात का खाना बंद।”

    ये लीजिए इन बुज़ुर्गों को तो किसी करवट चैन नहीं। हम लोगों ने भी ये तय कर लिया कि अब चाहे कुछ भी हो जाए, हिल कर पानी भी नहीं पिएँगे।

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