मुन्तख़ब अख़्तर-उल-ईमान

आधुनिक उर्दू नज़्म के संस्थापकों में शामिल। अग्रणी फ़िल्म-संवाद लेखक। फ़िल्म ' वक़्त ' और ' क़ानून ' के संवादों के लिए मशहूर।

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एक लड़का

दयार-ए-शर्क़ की आबादियों के ऊँचे टीलों पर

अख़्तरुल ईमान

तब्दीली

इस भरे शहर में कोई ऐसा नहीं

अख़्तरुल ईमान

मस्जिद

दूर बरगद की घनी छाँव में ख़ामोश ओ मलूल

अख़्तरुल ईमान

यादें

लो वो चाह-ए-शब से निकला पिछले-पहर पीला महताब

अख़्तरुल ईमान

आख़िरी मुलाक़ात

आओ कि जश्न-ए-मर्ग-ए-मोहब्बत मनाएँ हम!

अख़्तरुल ईमान

अपाहिज गाड़ी का आदमी

कुछ ऐसे हैं जो ज़िंदगी को मह-ओ-साल से नापते हैं

अख़्तरुल ईमान

तफ़ाउत

हम कितना रोए थे जब इक दिन सोचा था हम मर जाएँगे

अख़्तरुल ईमान

कल की बात

ऐसे ही बैठे इधर भय्या थे दाएँ जानिब

अख़्तरुल ईमान

तस्कीन

इक मुहक़क़िक़ ने इंसान को बुज़ना जब कहा

अख़्तरुल ईमान