आह देखी थी मैं जिस घर में परी की सूरत

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

आह देखी थी मैं जिस घर में परी की सूरत

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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    आह देखी थी मैं जिस घर में परी की सूरत

    अब नज़र आए है वाँ नौहागरी की सूरत

    वो अंदाज़ आवाज़ इश्वा अदा

    यक-ब-यक मिट गई यूँ जल्वागरी की सूरत

    अब ख़याल उस का वहाँ आँखों में फिरता है मिरी

    कोई फिरता था जहाँ कब्क-ए-दरी की सूरत

    उस के जाने से मिरा दिल है मिरे सीने में

    दम का मेहमान चराग़-ए-सहरी की सूरत

    ने ख़बर उस को मिरी पहुँचे है ने उस की मुझे

    बंध गई है अजब इक बे-ख़बरी की सूरत

    नाम लूँ किस का कि इक गुल के लिए जाते हैं

    अश्क आँखों से अक़ीक़-ए-जिगरी की सूरत

    'मुसहफ़ी' है यही अब सोच कि देखें तो फ़लक

    फिर भी दिखलाएगा यार-ए-सफ़री की सूरत

    स्रोत :
    • पुस्तक : kulliyat-e-mas.hafii(Vol-4)(pdf) (पृष्ठ 99)
    • रचनाकार : Ghulam hamdani Mashafi
    • प्रकाशन : Qaumi council baraye -farogh urdu (2005)
    • संस्करण : 2005

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