मीरा जी की नज़्में

मीराजी

शाहिद क़ुरैशी
| अन्य

पुस्तक: परिचय

परिचय

میراجی کی غیر مطبوعہ نظموں کا مجموعہ ہے۔جس میں میراجی کے نظمیں "الجھن کی کہانی،دو نقشے،نغمہ محبت،چھیڑ،تحلیل کی بعد،زندگی ختم ہوئی وغیرہ شامل ہیں۔میری جی کا شعری افق بہت وسیع تھاخصوصا ان کے مطالعے کی وسعت نے انہیں ارد وکے علاوہ دوسری زبانوں کے جس شعری سرمائے سے روشناس کرایا تھا۔اس نے ان کے شعری ذوق اور شعری دنیا کی سرحدوں کو بہت پھیلایا ہے۔شاعری خصوصا نظم میں ان کی خدمات اور کام کو کسی صورت بھی نظر انداز نہیں کیا جاسکتا۔میرا جی صرف ایک شاعر ہی نہیں تھے بلکہ اپنی جگہ ایک مکمل ہنگامہ بھی تھے۔انھوں نے اپنی نظموں میں نئے طر ز کو اپنایا تھا۔عام طور پر میراجی ایک مشکل شاعر سمجھے جاتے ہیں حالانکہ ان کا کلام انتہائی عام فہم اور عوامی زبان میں ہے۔

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लेखक: परिचय

मीराजी

मीराजी

उर्दू का बोहेमियन शायर
“बहैसियत शायर उस (मीरा जी) की हैसियत वही है जो गले सड़े पत्तों की होती है, जिसे खाद के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। मैं समझता हूं उसका काम बहुत उम्दा खाद है जिसकी उपयोगिता एक न एक दिन ज़रूर ज़ाहिर हो कर रहेगी। उसकी शायरी एक गुमराह इंसान का काम है जो इंसानियत की गहरी पस्तियों से सम्बद्ध होने के बावजूद दूसरे इंसानों के लिए ऊंची फ़िज़ाओं में मुर्ग़ बादनुमा का काम दे सकता है। इसका कलाम इक JIGSAW PUZZLE है जिसके टुकड़े बड़े इत्मीनान-ओ-सुकून से जोड़ कर देखने चाहिऐं''।
सआदत हसन मंटो

मीरा जी का नाम उर्दू में आज़ाद नज़्म और प्रतीकात्मक शायरी को प्रचलित करने और उसे फ़रोग़ देने वालों में सर्वोपरि है। नून मीम राशिद का कहना था कि मीरा जी महज़ शायर नहीं  एक Phenomenon हैं। मीरा जी ने हिंदुस्तान की दूसरी भाषाओँ के साथ साथ पश्चिमी साहित्यिक रुझान, आधुनिक मनोविज्ञान और हिंदू देवमाला की रूह को आत्मसात करके उसे शुद्ध हिंदुस्तानी भाषा का जामा पहनाया। उन्होंने एक तरफ़ हिंदुस्तान के चंडीदास, मीरा बाई और विद्यापति का असर क़बूल किया तो दूसरी तरफ़ फ्रान्कोई विलेन, चार्ल्स बोदलियर और मेलारमे (फ़्रांसीसी) विटमैन और पौ(अमरीकी) डी ऐच लॉरंस और कैथरीन मेंसफील्ड (बर्तानवी), पुश्किन (रूसी) और हाइने (जर्मन) के अदबी रवैय्यों का जौहर तलाश करके उसे उर्दू शायरी के शरीर में दाख़िल किया। मीरा जी का कहना था कि महज़ अज़ाद नज़्म के आकार को इस्तेमाल करके कोई जदीद शायर नहीं बन जाता। इसके लिए आधुनिक संवेदना भी ज़रूरी है। उनके विभिन्न काव्य, मनोवैज्ञानिक और संवेदी अनुभवों के संयोजन ने मीरा जी की शायरी को मुश्किल लेकिन अद्वितीय और वास्तविक बना दिया। डाक्टर जमील जालबी के शब्दों में “मीरा जी की शायरी समाज के एक ऐसे ज़ेहन की तर्जुमानी करती है कि मीरा जी से कम नैतिक साहस रखने वाला व्यक्ति उसको प्रस्तुत ही नहीं कर सकता था और मीरा जी की शायरी में ईमानदारी और सच्चाई का वो तत्व पाया जाता है कि हम उनकी शायरी का सम्मान करने पर मजबूर हो जाते हैं।” ये हक़ीक़त है कि मीरा जी की शायरी ने अपने पाठकों पर उतना प्रभाव नहीं डाला जितना समग्र रूप से अपने बाद लिखे जाने वाले अदब पर डाला है।

क़ुदरत का करिश्मा देखिए कि उसने शायरी का ये गुलाब गोबर के ढेर पर खिलाया। मीरा जी का ऊपरी व्यक्तित्व बहुत ही ग़लीज़ और भोंडा था। मैले कुचैले कपड़े, हर मौसम में जाड़ों का लिबास, लंबी चीकट ज़ुल्फ़ें, गंदे नाख़ून, गले में गज़ भर की माला, हाथ में लोहे के तीन गोले जिन पर सिगरेट की पन्नी मढ़ी होती, दिन रात नशे में धुत, हस्तमैथुन की लत और उसकी अभिमानी अभिव्यक्ति, रंडीबाज़ी और उसके नतीजे में आतिश्क, सभ्य महफ़िलों में जूतों सहित उकड़ूँ कुर्सी पर बैठना, सालन में ज़र्दा या खीर मिला कर खाना, मुशायरे में श्रोताओं की तरफ़ पीठ कर के नज़्म सुनाना, नशे में धाड़ें मार मार कर रोना, अस्पताल में नर्स की कलाई दाँतों से काट लेना। हद दर्जा जिन्सी परवर्ज़न, इन सब बातों ने मीराजी की शख़्सियत को अफ़साना बना दिया। ऐसी शख़्सियत जो उनकी शायरी के अध्ययन में आड़े आती है और अक्सर उनके पाठक और उनकी शायरी के दरम्यान आड़ बन कर खड़ी हो जाती है।

मीरा जी का असल नाम मोहम्मद सना उल्लाह डार था। वो 25 मई 1912 को लाहौर में पैदा हुए। उनका ख़ानदान कुछ पीढ़ियों पहले कश्मीर से आकर गुजरांवाला में आबाद हो गया था। मीरा जी के वालिद मुंशी महताब उद्दीन रेलवे में ठेकेदारी करते थे। एक बार उनको कारोबार में इतना घाटा हुआ कि कौड़ी कौड़ी के मुहताज हो गए। तब एक अंग्रेज़ इंजिनियर ने उन्हें ब्रिज इंस्पेक्टर बना दिया और वो नौकरी के सिलसिले में विभिन्न स्थानों पर रहे। मीराजी की वालिदा सरदार बेगम उनकी दूसरी बीवी और उम्र में उनसे बहुत छोटी और बहुत ख़ूबसूरत होने की वजह से शौहर पर हावी थीं। माँ से मीरा जी को बहुत मुहब्बत थी और वो उनको पीड़िता समझते थे। मीरा जी के बचपन और नौजवानी का कुछ हिस्सा हिंदुस्तान की रियासत गुजरात में गुज़रा। उनको पाठ्यक्रम की किताबों से कोई दिलचस्पी नहीं थी जबकि दूसरी अदबी और इलमी किताबों का कीड़ा थे। वो मैट्रिक का इम्तिहान नहीं पास कर सके। “अदबी दुनिया” के संपादक मौलाना सलाह उद्दीन मुंशी महताब उद्दीन के दोस्त थे। मुंशी जी ने अवकाशप्राप्त के बाद जो कुछ मिला था वो मौलाना सलाह उद्दीन के साथ कारोबार में लगा दिया लेकिन पैसा डूब गया और मुंशी जी के सम्बंध मौलाना से ख़राब हो गए। मैट्रिक में फ़ेल होने के बाद मीरा जी ने बाप की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मौलाना की पत्रिका “अदबी दुनिया” में तीस रुपये मासिक पर नौकरी कर ली और यहीं से उनके अदबी सफ़र का आग़ाज़ हुआ। “अदबी दुनिया” में काम करते हुए मीरा जी ने बहुत से पाश्चात्य और प्राच्य शायरों की ज़िंदगी और उनके अदब से “उर्दू दुनिया” को बाख़बर करने के लिए आलेख लिखे और उनकी रचनाओं के अनुवाद किए जो बाद में “मशरिक़-ओ-मग़रिब के नग़मे” के नाम से पुस्तकार में प्रकाशित हुआ। इस मध्य “अदबी दुनिया” और अन्य पत्रिकाओं में उनकी मुद्रित रचनाएं प्रकाशित होने लगीं और उनके आलोचनात्मक आलेख ने पाठकों को आकर्षित किया। लाहौर में स्कूल के ज़माने में उनको एक बंगाली लड़की मीरा सेन से इश्क़ हो गया। ये ऐसी शदीद आसक्ति थी, कि सना उल्लाह डार ने अपना तख़ल्लुस साहिरी से बदल कर मीरा जी रख लिया। वो मीरा सेन का ख़ासे फ़ासले से पीछा करते थे और सिर्फ एक बार उसे रास्ते में रोक कर बस इतना कह सके थे कि “मुझे आपसे कुछ कहना है।” मीरा सेन कोई जवाब दिए बग़ैर उनको ग़ुस्से से घूरते हुए आगे बढ़ गई थी। मीरा जी ने अपने इस जुनूनी इश्क़ का बड़ा ढंडोरा पीटा जबकि हसन अस्करी का बयान कुछ और ही है। उनका कहना है कि “एक दिन कोई बंगाली लड़की उनके सामने से गुज़री। दोस्तों ने यूँ ही मज़ाक़ में कहा कि ये उनकी महबूबा है। दो-चार दिन लड़कों ने मीरा का नाम लेकर उन्हें छेड़ा और वो ऐसे बने रहे जैसे वाक़ई चिड़ रहे हों। फिर जब उन्होंने देखा कि दोस्त उन्हें अफ़साना बना देना चाहते हैं, वो बिना झिझक बन गए और उसके बाद उनकी सारी उम्र उस अफ़साने को निभाने में गुज़री।” संदेह नहीं कि अपनी बिगड़ी आदतों, शराबनोशी और आत्म भोग की आदत के लिए उनको मीरा सेन के इश्क़ में नाकामी की स्थिति में एक औचित्य की ज़रूरत पड़ी हो। मीरा जी 1938 से 1941 तक “अदबी दुनिया” से सम्बद्ध रहे। तनख़्वाह बहुत कम थी लेकिन उस नौकरी ने उनके विचारों और चेतना को प्रज्वलित किया जिसने उन्हें मीरा जी बनाया। 1941 में उनको रेडियो स्टेशन लाहौर पर नौकरी मिल गई और 1942 में उनका तबादला दिल्ली रेडियो स्टेशन पर हो गया। अब उनकी आर्थिक स्थिति ठीक थी लेकिन दूसरी तमाम बुरी आदतें जारी थीं बल्कि उनमें तवाएफ़ों के कोठों पर जाने का इज़ाफ़ा भी हो गया था जहाँ से वो आतिश्क का तोहफ़ा भी ले आए थे। उनको अपनी सभी बुरी आदतों को प्रचारित करने के भी शौक़ीन थे और ऐसा कर के लुत्फ़ हासिल करते थे। मीरा सेन से अपने दुनिया से निराले इश्क़ के बुलंद बाँग दावों के बावजूद उन्होंने दफ़्तर की दो तेज़ तर्रार कर्मचारी लड़कियों सहाब क़ज़लबाश और सफिया मोईनी के साथ इश्क़ की पेंगें बढ़ाने की कोशिश की लेकिन उनके पास ऐसा कुछ नहीं था जो उन शोख़ लड़कियों को प्रभावित कर सके। जब वो ज़्यादा पीछे पड़े तो सफिया मोईनी ने कह दिया, “मीरा जी, रहने दीजिए, आप हैं किस लायक़।” 1945 में मीरा जी की शामत ने उन्हें घेरा और फिल्मों में क़िस्मत आज़माने बंबई पहुंच गए।

बंबई पहुंच कर मीरा जी के चौदह तबक़ रोशन हो गए। तीन महीने तक कोई काम नहीं मिला। वो कभी इसके पास और कभी उसके पास बिन बुलाए मेहमान की तरह वक़्त गुज़ारते रहे। फिर पूना चले गए जहां अख़तरुलईमान थे। अख़तरुलईमान ने उनको मुहब्बत से अपने पास रखा। पूना में भी उनकी नौकरी का कोई बंदोबस्त नहीं हो सका। विवशतः वो 16 अक्तूबर 1947 को बंबई वापस आ गए। कुछ दिनों बाद अख़तरुलईमान भी बंबई आ गए तो उन्होंने रिसाला “ख़्याल” निकाला और संपादन मीरा जी को सौंप दिया। इसके लिए वो मीरा जी को 100 रुपये मासिक देते थे। अब तक शराबनोशी की अधिकता और खाने-पीने में अनियमितता की वजह से उनकी सेहत बहुत ख़राब हो चुकी थी। उनको दस्त की शिकायत थी लेकिन न परहेज़ करते थे और न ईलाज। जब हालत ख़राब होते देखी तो अख़तरुलईमान उनको अपने घर ले गए लेकिन वहां भी वो परहेज़ नहीं करते थे। जब हालत ज़्यादा बिगड़ी तो उनको सरकारी अस्पताल में दाख़िल करा दिया गया जहां वो कैंटीन वालों और दूसरे मुलाज़मीन से बल्कि कभी कभी साथ के मरीज़ों से भी खाना मांग कर बदपरहेज़ी करते थे। उनकी दिमाग़ी हालत भी ठीक नहीं थी। डाक्टरों का कहना था कि आतिश्क के मरीज़ों में अक्सर इस तरह की पेचीदगियां पैदा हो जाती हैं। मीरा जी के आख़िरी दिन बहुत ही पीड़ादायक थे। उनके सारे बाल सफ़ेद हो गए थे। हाथों पैरों और पेट पर सूजन था, ख़ून बनना बिल्कुल बंद हो गया था। 3 नवंबर 1949 को उनका देहांत हो गया। जनाज़े में पाँच आदमी थे, अख़्तरुलईमान, महेन्द्रनाथ, मधु सूदन, नजम नक़वी और आनंद भूषण। तदफ़ीन मेरिन लाईन क़ब्रिस्तान में हुई। बहुत कोशिशों के बावजूद बंबई के किसी अख़बार ने उनकी मौत पर एक पंक्ति की ख़बर भी प्रकाशित नहीं की।

मीरा जी की उपलब्ध काव्य रचनाओं को समग्र (कुल्लियात) के रूप में जमा किया जा चुका है जिसमें 223 नज़्में,136 गीत,17 ग़ज़लें, 22 छंदोबद्ध अनुवाद, 5 हज़लियात और विविध शामिल हैं। गद्य में उन्होंने दामोदर गुप्त की क़दीम संस्कृत किताब “कटनी मुतिम” का अनुवाद “निगार-ख़ाना” के नाम से किया। विविध आलोचनात्मक आलेख इसके इलावा हैं।

मीरा जी एक नए दबिस्तान ए शे’री के संस्थापक हैं। उनका विषय इंसान का बाह्य नहीं अंतः है। इंसान की वो चेतन और अवचेतन अवस्थाएं, जो उसके विचारों व कार्यों की प्रेरणा होती हैं, मीरा जी ने उनकी अभिव्यक्ति के लिए नई भाषा, नए प्रतीकों, नई शब्दों और नए पात्रों का आविष्कार करने की कोशिश की। उनकी नज़्मों में हिंदुस्तानी फ़िज़ा बहुत स्पष्ट और गहरी है मीरा जी ने भाषा और अभिव्यक्ति के जो अनुभव किए और जिस ज़ौक़-ए-शे’र के पदोन्नति की कोशिश की उसके नतीजे में उनकी हैसियत एक भटके हुए शायर की नहीं बल्कि ऐसे फ़नकार की है जिसने एक ऐसे काव्यात्मक शैली की नींव रखी जिसमें एक महान शायरी की संभावनाएं छुपी हैं।

 

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