संग-ए-मील

क़तील शिफ़ाई, ख़ातिर ग़ज़नवी, फ़ारिग़ बुख़ारी

नया मकतबा, पेशावर
1947 | अन्य

संपादक: परिचय

क़तील शिफ़ाई

क़तील शिफ़ाई

क़तील शिफ़ाई, औरंगज़ेब ख़ाँ

 

1919-2001

रूमानीअन्दाज़केबेइन्तिहालोकप्रियशाइर।पाकिस्तानकेप्रमुखतमफ़िल्म-गीतकारोंमेंशामिल।प्रगतिशीलऔरमानवतावादीविचारधाराकेपक्षघर।ज़िलाहज़ारा(अबपाकिस्तानमें) मेंजन्ममगरसारीज़िन्दगीलाहौरमेंरहेऔरवहींदेहांतहुआ।

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ख़ातिर ग़ज़नवी

ख़ातिर ग़ज़नवी

ख़ातिर ग़ज़नवी का असल नाम मुहम्मद इब्राहीम बेग था .वह 25 नवंम्बर 1925 को पेशावर में पैदा हुए. पेशावर यूनिवर्सिटी से उर्दू में एम.ए. किया और उसी विभाग में शिक्षा-दीक्षा से सम्बद्ध हो गये. उर्दू के अलावा कई और भाषाए सीखीं,विशेषतः चीनी भाषा में दक्षता प्राप्त की. ‘संगे मील’ और ‘एहसास’ के साथ कई पत्रिकाओं और अख़बारों के एडिटर भी रहे. एक अर्से तक रेडियो पाकिस्तान पेशावर से भी सम्बद्ध रहे.
ख़ातिर ग़ज़नवी के शेरी मज्मुओं में ‘रूपनगर’ ‘ख़्वाब दर ख़्वाब’ ‘शाम की छतरी’ और ‘कोंजान’ और गद्य की पुस्तकों में ‘ज़िन्दगी के लिए’, ‘फूल और पत्थर’, ‘चट्टानें और रुमान’, ‘रज़्मनामा’, ‘सरहद के रुमान’ ‘दस्तारनामा’ ‘पठान और जज़्बाते लतीफ़’ ‘ख़ूशहालनामा’ ‘चीननामा’ के नाम शामिल हैं.
हुकूमते पाकिस्तान ने उनके समग्र साहित्यिक सेवाओं को स्वीकार करते हुए उन्हें सदारती तम्ग़ा बराए हुस्ने कारकर्दगी से नवाज़ा. 7 जुलाई 2008 को पेशावर में देहांत हुआ.

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फ़ारिग़ बुख़ारी

फ़ारिग़ बुख़ारी

फ़ारिग़ बुखारी का नाम अहमद शाह था. 11 नवम्बर 1917 को पेशावर में पैदा हुए. इंटरमीडिएट तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद प्राच्य भाषाओं के कई इम्तहानात पास किये. फ़ारिग़ बुखारी वैचारिक स्तर पर प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े हुए थे लेकिन इस वैचारिक सम्बद्धता ने उनकी रचनात्मक व्यापकता को कम नहीं होने दिया. वह विषय, भाषा और शे’री रचनाओं में नये-नये प्रयोग करते रहे. उनका एक विशिष्ट प्रयोग ग़ज़ल के फॉर्म में है. उन्होंने अपने काव्य संग्रह ‘ग़ज़लिया’ में रूप और तकनीक को एक नये अंदाज़ में प्रयोग किया है.

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