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पहचान: प्रसिद्ध अफ़सानानिगार, शोधकर्ता, अनुवादक और उर्दू फ़िक्शन के अनूठे शैलीकार
नैर मसऊद का जन्म 16 नवंबर 1936 को लखनऊ में मशहूर उर्दू आलोचक और लेखक सैयद मसऊद हसन रिज़वी “अदीब” के घर हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एम.ए. किया और बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उर्दू में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। अपने शिक्षकीय जीवन की शुरुआत इस्लामिया कॉलेज, बरेली से की, फिर लखनऊ विश्वविद्यालय के फ़ारसी विभाग से जुड़े रहे और 1996 में प्रोफ़ेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए।
नैर मसऊद उर्दू अफ़साने में अपनी रहस्यमय, प्रतीकात्मक और विशिष्ट शैली के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उनकी कहानियों में लखनऊ की तहज़ीब, पतनशील समाज, स्वप्निल वातावरण और मानवीय अकेलेपन की गहरी झलक मिलती है। उन्हें आधुनिक उर्दू कहानी को नई सौंदर्यात्मक दिशा देने वाले महत्वपूर्ण कथाकारों में गिना जाता है।
उनके प्रमुख कहानी-संग्रहों में “सीमिया”, “ताऊस चमन की मैना”, “अत्तर-ए-काफ़ूर” और “गंजफ़ा” शामिल हैं। “ताऊस चमन की मैना” को उर्दू के महत्वपूर्ण कहानी-संग्रहों में गिना जाता है। नैर मसऊद ने शोध, आलोचना और अनुवाद के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया। उनकी महत्वपूर्ण पुस्तकों में “रजब अली बेग सुरूर: हयात और कारनामे”, “मर्सिया-ख़्वानी का फ़न”, “अनीस”, “ताबीर-ए-ग़ालिब”, “अदबिस्तान” और “अफ़साने की तलाश” शामिल हैं। उन्होंने फ़्रांज़ काफ्का की कहानियों का उर्दू अनुवाद भी किया।
उनकी गद्य-शैली अपने विशिष्ट लहजे, तहज़ीबी चेतना और रचनात्मक प्रतीकात्मकता के कारण अलग पहचान रखती है।
उनकी साहित्यिक सेवाओं के सम्मान में उन्हें 2001 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 2007 में सरस्वती सम्मान से नवाज़ा गया।
निधन: नैर मसऊद का निधन 24 जुलाई 2017 को लखनऊ में हुआ।