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पहचान: रूसी क्रांतिकारी साहित्यकार, उपन्यासकार, नाटककार और समाजवादी यथार्थवाद के अग्रदूत
मैक्सिम गोर्की (मूल नाम: अलेक्सी मैक्सिमोविच पेश्कोव) का जन्म 28 मार्च 1868 को रूसी साम्राज्य के शहर निज़नी नोवगोरोद में हुआ। वे रूसी और विश्व साहित्य के उन महान लेखकों में गिने जाते हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से शोषित, पीड़ित और वंचित वर्गों की आवाज़ बुलंद की। “गोर्की” रूसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ “कड़वा” है, और यह उपनाम उन्होंने रूसी समाज की कड़वी सच्चाइयों को व्यक्त करने के लिए अपनाया।
गोर्की का प्रारम्भिक जीवन अत्यधिक गरीबी, अभाव और संघर्ष में बीता। बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण नाना के घर में हुआ। नाना की कठोरता और आर्थिक तंगी ने उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला, जबकि नानी की कहानियों और स्नेह ने उनके भीतर कल्पना और मानवता का भाव जगाया। उनकी माँ ने दूसरी शादी की, लेकिन शीघ्र ही क्षय रोग से उनका निधन हो गया। इसके बाद गोर्की को कम उम्र में ही जीविका के लिए अनेक कठिन काम करने पड़े। उन्होंने जूते की दुकान, जहाज़ के रसोईघर और अन्य मजदूरी के कार्य किए। इन्हीं अनुभवों ने आगे चलकर उनकी रचनाओं को यथार्थवाद, जनचेतना और मानवीय संवेदना प्रदान की।
शिक्षा के अवसर सीमित थे, लेकिन पढ़ने का शौक लगातार बढ़ता गया। जहाज़ के रसोईघर में काम करने वाले एक व्यक्ति ने उन्हें पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया। बाद में साहित्यिक वातावरण से जुड़ने पर उनका साहित्य से गहरा लगाव हो गया। युवावस्था में उन्होंने रूस के विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएँ कीं और मजदूरों, किसानों तथा सामान्य लोगों के जीवन को निकट से देखा। यही अनुभव उनकी शुरुआती कहानियों और उपन्यासों की बुनियाद बने।
1892 में उनकी पहली कहानी “मकार चुद्रा” प्रकाशित हुई, जिसके बाद साहित्यिक जगत में उनका नाम तेजी से उभरने लगा। 1898 में प्रकाशित उनके कहानी-संग्रह ने उन्हें पूरे रूस में प्रसिद्ध कर दिया। उनकी शुरुआती कहानियों में रूस के गरीब, मजदूर और बेघर लोगों का जीवन अत्यंत प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुआ। “चेल्काश”, “हमसफ़र” और “मालवा” जैसी कहानियाँ इसी दौर की प्रतिनिधि रचनाएँ हैं।
साहित्यिक प्रसिद्धि के साथ-साथ उनकी राजनीतिक सक्रियता भी बढ़ती गई। वे कार्ल मार्क्स के विचारों और समाजवादी आंदोलन से प्रभावित हुए तथा रूसी क्रांतिकारी हलकों से जुड़ गए। उनकी आय का बड़ा हिस्सा क्रांतिकारी गतिविधियों और समाजवादी विचारों के प्रचार में खर्च होने लगा। 1902 में उन्हें शाही अकादमी का सदस्य चुना गया, लेकिन ज़ार सरकार ने उनका चयन रद्द कर दिया। इसके विरोध में महान लेखक अंतोन चेखव ने भी अकादमी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।
1905 की रूसी क्रांति के दौरान गोर्की को गिरफ्तार किया गया, लेकिन यूरोप भर में विरोध होने के कारण सरकार को उन्हें रिहा करना पड़ा। क्रांति की असफलता के बाद वे फ़िनलैंड के रास्ते अमेरिका चले गए। अमेरिका में प्रारम्भ में उनका भव्य स्वागत हुआ, लेकिन निजी जीवन से जुड़े विवादों के बाद वे वहाँ के सामाजिक व्यवहार से निराश हो गए। बाद में वे इटली के द्वीप कैपरी में रहने लगे, जहाँ उन्होंने कई महत्वपूर्ण रचनाएँ लिखीं।
1917 की रूसी क्रांति के दौरान गोर्की ने क्रांतिकारी आंदोलन का समर्थन किया, लेकिन बोल्शेविक सरकार की कुछ कठोर नीतियों, सेंसरशिप और राजनीतिक दमन की आलोचना भी करते रहे। वे ऐसे बुद्धिजीवी थे जो क्रांति के समर्थक होते हुए भी विचारों की स्वतंत्रता और मानवीय मूल्यों पर समझौता नहीं करना चाहते थे।
गोर्की केवल उपन्यासकार ही नहीं, बल्कि महान नाटककार और पत्रकार भी थे। उनका प्रसिद्ध नाटक The Lower Depths रूसी समाज के निम्न वर्ग की विवशता और मानवीय गरिमा का प्रभावशाली चित्रण करता है। उनका उपन्यास “माँ” (1906) क्रांतिकारी साहित्य की क्लासिक कृति माना जाता है, जिसने दुनिया भर के प्रगतिशील आंदोलनों को गहराई से प्रभावित किया।
उनकी आत्मकथात्मक कृतियाँ “बचपन”, “जीवन की राहों पर” और “मंज़िल की तलाश” रूसी साहित्य की महत्वपूर्ण आत्मकथाओं में गिनी जाती हैं। इनमें उन्होंने अपने संघर्षों, वैचारिक विकास और रूसी समाज की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत की।
1934 में मैक्सिम गोर्की सोवियत लेखकों के संघ के पहले अध्यक्ष चुने गए और जीवन के अंतिम समय तक इस पद पर बने रहे। सोवियत सरकार ने उन्हें “समाजवादी यथार्थवाद” का प्रतिनिधि लेखक घोषित किया, यद्यपि सरकार के साथ उनके संबंध हमेशा जटिल रहे।
मैक्सिम गोर्की की प्रमुख रचनाओं में “माँ”, “बचपन”, “जीवन की राहों पर”, “मंज़िल की तलाश”, “मनुष्य का जन्म”, “इतालवी कहानियाँ” और “तीन राही” शामिल हैं। उनकी रचनाओं ने विश्वभर में क्रांतिकारी विचार, मजदूर आंदोलनों और मानव स्वतंत्रता के विचारों को नई शक्ति प्रदान की।
निधन: मैक्सिम गोर्की का निधन 18 जून 1936 को मॉस्को के निकट हुआ। उनकी मृत्यु पर विश्वभर के साहित्यिक और क्रांतिकारी हलकों में गहरा शोक व्यक्त किया गया।