aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
अल्लामा इक़बाल की उर्दू शायरी का अवलीन कुलियात जो मौलवी मुहम्मद अब्दुर रज़ाक़ ने 1924 ई. में इक़बाल की ज़िंदगी में प्रकाशित किया। यह किताब इक़बाल के शेरी इरतेक़ा और उनकी ज़िंदगी में उनके कलाम की मुआसिरानह पज़ीराई को समझने के लिए एक तारीखी हैसियत रखती है। डॉक्टर फ़रमान फ़तहपुरी का तारुफ़ इसकी अहमियत को उजागर करता है। यह 2007 की इशाअत सानी है।