aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
यह किताब जिगर बरेलवी की जानिब से उर्दू ज़बान की असलियत, इर्तेक़ा और हिंदुस्तान में उसके किरदार पर एक तहक़ीक़ी और तन्क़ीदी जायज़ा पेश करती है। मुसन्निफ़ ने उर्दू को हिंदुस्तानियों की मुश्तर्का ज़बान क़रार देने पर सवाल उठाया है और तक़सीम-ए-हिंद के बाद उसके मुमकिना मनफ़ी असरात का तज्ज़िया किया है। नासिर, हक़ परस्त, ने मुसन्निफ़ की बीमारी के बाइस इस मसौदे में तरमीम-ओ-तदवीन का काम ख़ुद अंजाम दिया है। यह किताब ज़बान, सक़ाफ़त और हिंदुस्तानी सियासत के बाहमी ताल्लुक़ात के एक मुतनाज़िया पहलू पर रौशनी डालती है।
जिगर बरेलवी एक बाकमाल शाइर, अदीब और आलोचक के रूप में जाने जाते हैं. उन्होंने नये रंग व मिज़ाज की शाइरी के साथ भाषा व साहित्य की समस्या पर भी बहुत इल्मी और शोधपूर्ण सरोकार के साथ लिखा. उनकी किताब ‘सेहत-ए-ज़बान’ नये भाषाई विमर्श से आगाह करती है.
जिगर ने कई विधाओं में शाइरी की. ख़ासतौर से ग़ज़ल, रुबाई और मसनवी उनके भरपूर रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनीं. जिगर की रुबाईयों का संग्रह ‘रस’ के नाम से प्रकाशित हुआ.
जिगर ने ‘हदीसे ख़ुदी’ के नाम से अपनी आत्मकथा लिखी. यह आत्मकथा जिगर की ज़िंदगी के दिलचस्प वाक़ेआत और सुंदर भाषाशैली की वजह से बहुत लोकप्रिय हुई. विभिन्न विषयों पर जिगर की और भी कई किताबें प्रकाशित हुईं. जिगर (असल नाम श्याम मोहन लाल) 1890 को बरेली में पैदा हुए थे और 1976 में देहांत हुआ.