कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

शाहिद माहुली

कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

शाहिद माहुली

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    कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

    आँखों में बस गया है वो मंज़र खुला हुआ

    बिस्तर था एक जिस्म थे दो ख़्वाहिशें हज़ार

    दोनों के दरमियान था ख़ंजर खुला हुआ

    उलझा ही जा रहा हूँ मैं गलियों के जाल में

    कब से है इंतिज़ार में इक घर खुला हुआ

    सहरा-नवर्द शहर की सड़कों पे गए

    चेहरे पे गर्द आबला-पा सर खुला हुआ

    स्रोत:

    • पुस्तक : Tahreek Silver Jubilee Number (पृष्ठ 427)
    • रचनाकार : Gopal Mittal, Makhmoor Saeedi, Prem Gopal Mittal
    • प्रकाशन : Monthly Tahreek, 9, Ansari Market, Daryaganj, New Delhi-110002 (July, Aug., Sep. Oct. 1978,Issue No. 4,5,6,7,Volume No. 26)
    • संस्करण : July, Aug., Sep. Oct. 1978,Issue No. 4,5,6,7,Volume No. 26

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