क्यूँ मलामत का हदफ़ गर्दिश-ए-पैमाना बने

अलक़मा शिबली

क्यूँ मलामत का हदफ़ गर्दिश-ए-पैमाना बने

अलक़मा शिबली

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    INTERESTING FACT

    आरज़ू लखनवी को समर्पित

    क्यूँ मलामत का हदफ़ गर्दिश-ए-पैमाना बने

    लग़्ज़िश-ए-पा से मिरी का'बा-ओ-बुत-ख़ाना बने

    अक़्ल के बस की नहीं बख़िया-गिरी फूलों की

    दर्द जिस को हो गुलिस्ताँ का वो दीवाना बने

    लब-ए-हिक्मत से शब-ओ-रोज़ उजाले टपके

    तीरा-ज़ेहनी का मगर ये भी मुदावा बने

    बे-सबब शौक़ नहीं माइल-ए-अफ़साना-गरी

    हर हक़ीक़त की ये ख़्वाहिश है कि अफ़्साना बने

    रुख़-ए-जानाँ के तसव्वुर ही में रातें गुज़रीं

    चाँद-तारे दिल-ए-महजूर की दुनिया बने

    आश्ना फ़स्ल-ए-बहाराँ ही नहीं है शायद

    क्या कहीं फूल कि क्यूँ सब्ज़ा-ए-बेगाना बने

    मैं तो हूँ शम-ए-सिफ़त-सोज़ सरापा 'शिबली'

    जिस को जलना नहीं आता हो वो परवाना बने

    स्रोत:

    • पुस्तक : Be-Chehrah Lamhe (पृष्ठ 69)
    • रचनाकार : Alqama Shibli
    • प्रकाशन : Shaharyaar Brothers Publications (1975)
    • संस्करण : 1975

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