नज़्र-ए-मिर्ज़ा-'ग़ालिब'
रोचक तथ्य
مرزا غالب کالج گیا کے سمینار میں پڑھی گئی نظم
वो ग़ालिब कल भी था और आज भी कल भी वही ग़ालिब
नहीं है होने वाला दूसरा अब कोई भी 'ग़ालिब'
वो कल की शा'इरी हो आज की हो या कभी की हो
है ग़ालिब हर ज़माने में तुम्हारी शा'इरी 'ग़ालिब'
तुम्हारे शे'र में मफ़हूम-ओ-मा'नी का जहाँ पिन्हाँ
है बहर-ए-बेकराँ सच-मुच तुम्हारी गुफ़्तनी 'ग़ालिब'
कोई भी शे'र फ़ितरत से अलग हो कर नहीं लिक्खा
हक़ीक़त पर तुम्हारी शा'इरी मब्नी रही 'ग़ालिब'
तुम्हारी गुल-फ़िशानी थी ख़िज़ाँ के दौर में जारी
कटी कितनी मुसीबत में तुम्हारी ज़िंदगी ग़ालिब
कई बेटों की पै-दर-पै जुदाई भी सही तुम ने
तुम्हारे सब्र-ओ-ज़ब्त-ए-नफ़्स के क़ाइल सभी ग़ालिब
तुम्हारा लहजा भी अंदाज़ भी उस्लूब भी बे-मिस्ल
तुम्हारी जैसी मैं ढूँडूँ कहाँ से शा'इरी 'ग़ालिब'
लताफ़त का फ़साहत का बलाग़त का है तू मूजिद
तू लफ़्ज़ों का इशारों का किनायों का धनी 'ग़ालिब'
दवा-ए-दर्द-ए-दिल के तुम न मिन्नत-कश हुए चूँकि
तुम्हारे 'इश्क़ में तुम पर रही अपनी ख़ुदी ग़ालिब
है फ़रियादी तुम्हारा नक़्श हर फ़रियाद पर भारी
सदाओं पर तुम्हारी है सदा-ए-दाइमी 'ग़ालिब'
मरे बुत-ख़ाना में तो गाड़ो का'बे में बरहमन को
जुनून-ए-'इश्क़ ऐसा कौन अब पाए कभी 'ग़ालिब'
तुम्हारी शा'इरी की धूम है सारे ज़माने में
बहादुर शाह की महफ़िल में भी सब पर रही ग़ालिब
हैं बाला-तर तुम्हारे शे'र कितने 'आम ज़ेहनों से
मगर होती रही अल्फ़ाज़ की जादूगरी ग़ालिब
तुम्हारी नज़रों से कोई न सूरत बच सकी 'ग़ालिब'
तुम्हारे ज़ौक़ की विजदानी-ओ-नुदरत का क्या कहना
कि ज़ख़्मों के नमक पलकों से चुनते थे कभी 'ग़ालिब'
उठाया संग था तो क्यों नहीं फेंका था मजनूँ पर
लड़कपन ही से तुम पर फ़िक्र क्यों सर की रही 'ग़ालिब'
न छूटी मय कभी चक्कर न कू-ए-यार का छूटा
मगर छूटा नहीं हाथों से दामान-ए-ख़ुदी 'ग़ालिब'
हज़ारों शा'इरों ने कितने दीवान अपने छपवाए
मगर इक धाक बस दीवान-ए-'ग़ालिब' की रही ग़ालिब
तसव्वुर आज 'ग़ालिब' का 'हसन' के ज़ह्न पर ग़ालिब
ब-नाम-ए-मिर्ज़ा-'ग़ालिब' सब पे ये महफ़िल हुई ग़ालिब
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.