सफ़ा और सिद्क़ के बेटे

ज़ुबैर रिज़वी

सफ़ा और सिद्क़ के बेटे

ज़ुबैर रिज़वी

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    पुरानी बात है

    लेकिन ये अनहोनी सी लगती है

    सवाद-ए-शर्क़ का इक शहर

    तारीकी में डूबा था

    अचानक शोर सा उट्ठा

    ज़मीं जैसे तड़ख़ जाए

    नदी में बाढ़ जाए

    कोई कोह-ए-गिराँ जैसे जगह से अपनी हट जाए

    बड़ा कोहराम था

    ख़िल्क़त

    मताअ-ओ-माल से महरूम नंगे सर

    घरों से चीख़ कर निकली

    मगर आल-ए-सफ़ा-ओ-सिद्क़ के ख़ेमे नहीं उखड़े

    वो अपनी ख़्वाब-गाहों से नहीं निकले

    रिवायत है

    सफ़ा-ओ-सिद्क़ के बेटे

    हमेशा रात आते ही

    हिसार-ए-हम्द

    अपने चार जानिब खींच लेते थे

    मुक़द्दस आयतों को अपने पे दम कर के सोते थे

    रिवायत है

    बलाएँ उन के दरवाज़ों से

    वापस लौट जाती थीं

    सवाद-ए-शर्क़ का वो शहर

    उस शब ढेर था लेकिन

    सफ़ा-ओ-सिद्क़ की औलाद के ख़ेमे नहीं उखड़े

    स्रोत:

    • पुस्तक : purani baat hai (पृष्ठ 9)
    • रचनाकार : zubair rizvii
    • प्रकाशन : maktaba jamia limited (1977)
    • संस्करण : 1977

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