आलिम अख़्तर जाज़िब के शेर
बात तो कर लूँ मगर ज़िद कैसे
बात कच्ची है ख़ुदा से मेरी
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एक बे-सुध जिस्म की दिल-जूई में
सिलवटों में घुल रही है चाँदनी
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गो ज़बाँ आई ज़माने में तभी
जब हुआ पैदा ख़ुदा का हम-सुख़न
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