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आबाद लखनवी

1813

फ़क़त उमीद है बख़्शिश की तेरी रहमत से

वगर्ना अफ़्व के क़ाबिल मिरे गुनाह नहीं

उड़ाऊँ क्यूँ गरेबाँ की धज्जियाँ हैहात

वही ये हाथ हैं जिन में किसी का दामन था

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