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अजमल सिद्दीक़ी

1981 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 10

शेर 11

बोल पड़ता तो मिरी बात मिरी ही रहती

ख़ामुशी ने हैं दिए सब को फ़साने क्या क्या

कभी ख़ौफ़ था तिरे हिज्र का कभी आरज़ू के ज़वाल का

रहा हिज्र-ओ-वस्ल के दरमियाँ तुझे खो सका मैं पा सका

दिल तो सादा है तेरी हर बात को सच्चा मानता है

अक़्ल ने बातें करते तेरा आँख चुराना देखा है

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