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अखिलेश तिवारी

1966 | जयपुर, भारत

अखिलेश तिवारी के शेर

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वह शक्ल वह शनाख़्त वह पैकर की आरज़ू

पत्थर की हो के रह गई पत्थर की आरज़ू

हँसना रोना पाना खोना मरना जीना पानी पर

पढ़िए तो क्या क्या लिक्खा है दरिया की पेशानी पर

सुब्ह-सवेरा दफ़्तर बीवी बच्चे महफ़िल नींदें रात

यार किसी को मुश्किल भी होती है इस आसानी पर

अक़्ल वालों में है गुज़र मेरा

मेरी दीवानगी सँभाल मुझे

हर-दम बदन की क़ैद का रोना फ़ुज़ूल है

मौसम सदाएँ दे तो बिखर जाना चाहिए

ख़याल आया हमें भी ख़ुदा की रहमत का

सुनाई जब भी पड़ी है अज़ान पिंजरे में

बे-सबब कुछ भी नहीं होता है या यूँ कहिए

आग लगती है कहीं पर तो धुआँ होता है

फिसलन ये किनारों ये ठहराव नदी का

सब साफ़ इशारे हैं कि गहराई बहुत है

तो क्या पलट के वही दिन फिर आने वाले हैं

कई दिनों से है दिल बे-क़रार पहले सा

कोई तो बात है पिछले पहर में रातों के

ये बंद कमरा अजब रौशनी से भर जाए

यहीं से राह कोई आसमाँ को जाती थी

ख़याल आया हमें सीढ़ियाँ उतरते हुए

जिसे परछाईं समझे थे हक़ीक़त में पैकर हो

परखना चाहिए था आप को उस शय को छू कर भी

क़दम बढ़ा तो लूँ आबादियों की सम्त मगर

मुझे वो ढूँढता तन्हाइयों में आया तो