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अख़्तर रज़ा सलीमी

1974 | इस्लामाबाद, पाकिस्तान

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गुज़र रहा हूँ किसी जन्नत-ए-जमाल से मैं

गुनाह करता हुआ नेकियाँ कमाता हुआ

अब ज़मीं भी जगह नहीं देती

हम कभी आसमाँ पे रहते थे

ख़्वाब गलियों में फिर रहे थे और

लोग अपने घरों में सोए थे

इक आग हमारी मुंतज़िर है

इक आग से हम निकल रहे हैं

पहले तराशा काँच से उस ने मिरा वजूद

फिर शहर भर के हाथ में पत्थर थमा दिए

तुझे ख़बर नहीं इस बात की अभी शायद

कि तेरा हो तो गया हूँ मगर मैं हूँ उस का

हम आए रोज़ नया ख़्वाब देखते हैं मगर

ये लोग वो नहीं जो ख़्वाब से बहल जाएँ

दिल निगाह पे तारी रहे फ़ुसूँ उस का

तुम्हारा हो के भी मुमकिन है मैं रहूँ उस का

आए अदम से एक झलक देखने तिरी

रक्खा ही क्या था वर्ना जहान-ए-ख़राब में

तुम्हारे होने का शायद सुराग़ पाने लगे

कनार-ए-चश्म कई ख़्वाब सर उठाने लगे

सुना गया है यहाँ शहर बस रहा था कोई

कहा गया है यहाँ पर मकान होते थे

यहीं कहीं पे कोई शहर बस रहा था अभी

तलाश कीजिए इस का अगर निशाँ कोई है

जिस्मों से निकल रहे हैं साए

और रौशनी को निगल रहे हैं