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अलीम अख़्तर

1914 - 1972 | मेरठ, भारत

पूर्वाधुनिक शायर, क्लासिकी रंग में ग़ज़लें कहीं. मासिक ‘शमा’ से सम्बद्ध रहे, बच्चों के लिए लिखी गई नज़्मों का एक संग्रह भी प्रकाशित हुआ

पूर्वाधुनिक शायर, क्लासिकी रंग में ग़ज़लें कहीं. मासिक ‘शमा’ से सम्बद्ध रहे, बच्चों के लिए लिखी गई नज़्मों का एक संग्रह भी प्रकाशित हुआ

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दर्द बढ़ कर दवा हो जाए

ज़िंदगी बे-मज़ा हो जाए

ये और बात कि इक़रार कर सकें कभी

मिरी वफ़ा का मगर उन को ए'तिबार तो है

मेरी बेताबियों से घबरा कर

कोई मुझ से ख़फ़ा हो जाए

दर्द का फिर मज़ा है जब 'अख़्तर'

दर्द ख़ुद चारासाज़ हो जाए

हमें दुनिया में अपने ग़म से मतलब

ज़माने की ख़ुशी से वास्ता क्या

वो तअल्लुक़ है तिरे ग़म से कि अल्लाह अल्लाह

हम को हासिल हो ख़ुशी भी तो गवारा करें

मुझे तो कल भी था उन पर इख़्तियार कोई

और उन को मुझ पे वही इख़्तियार आज भी है

मुझे आँखें दिखाएगी भला क्या गर्दिश-ए-दौराँ

मिरी नज़रों ने देखा है तिरा ना-मेहरबाँ होना

मेरे सुकून-ए-क़ल्ब को ले कर चले गए

और इज़्तिराब-ए-दर्द-ए-जिगर दे गए मुझे

मआल-ए-ज़ब्त-ए-पैहम हो गई है

मसर्रत हासिल-ए-ग़म हो गई है