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अशोक साहनी

1938 | दिल्ली, भारत

ज़माने ने लगाईं मुझ पे लाखों बंदिशें लेकिन

सर-ए-महफ़िल मिरी नज़रों ने तुम से गुफ़्तुगू कर ली

तिरी सूरत से हसीं और भी मिल जाएँगे

जिस में सीरत भी तिरी हो वो कहाँ से लाऊँ