अज़हर सज्जाद के शेर
अपने मे'यार से नीचे मैं भला क्यों आऊँ
तुम जिसे ज़ो'म समझते हो वो ख़ुद्दारी है
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फिर मुलाक़ात का तूफ़ान उठा है दिल में
फिर से इक बार बिछड़ जाने की तय्यारी है
रोज़ ज़िंदान की दीवार पे लिखता है कोई
हाए तन्हाई सलासिल से कहीं भारी है