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दुष्यंत कुमार

1933 - 1975 | मुरादाबाद, भारत

ग़ज़ल 10

हिंदी ग़ज़ल 14

शेर 19

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है

जिस में तह-ख़ानों से तह-ख़ाने लगे हैं

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तिरा निज़ाम है सिल दे ज़बान-ए-शायर को

ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए

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ये सोच कर कि दरख़्तों में छाँव होती है

यहाँ बबूल के साए में के बैठ गए

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वीडियो 10

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