ग़ज़ल 1

 

शेर 2

जागते जागते इक उम्र कटी हो जैसे

जान बाक़ी है मगर साँस रुकी हो जैसे

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कोई फ़रियाद तिरे दिल में दबी हो जैसे

तू ने आँखों से कोई बात कही हो जैसे

 

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अज्ञात

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