इसहाक़ विरदग के शेर

बाज़ार हैं ख़ामोश तो गलियों पे है सकता

अब शहर में तन्हाई का डर बोल रहा है

ऐसी तरक़्क़ी पर तो रोना बनता है

जिस में दहशत-गर्द क्रोना बनता है

किसी की याद मनाने में ईद गुज़रेगी

सो शहर-ए-दिल में बहुत दूर तक उदासी है

ख़ैरात में दे आया हूँ जीती हुई बाज़ी

दुनिया ये समझती है कि मैं हार गया हूँ

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI