ज़हर ज़िंदगानी का पी के अक़्ल आई है

दारू-ए-ग़म-ए-हस्ती तलख़ी-ए-सुबू में है

भीड़ में ज़माने की हम सदा अकेले थे

वो भी दूर है कितना जो रग-ए-गुलू में है