जौहर ज़ाहिरी

ग़ज़ल 16

शेर 2

हम रहे हैं मंज़िलों ही मंज़िलों में उम्र भर

जैसे क़िस्मत में किसी पहलू शकेबाई थी

वो लोग जो कि मआल-ए-चमन से वाक़िफ़ हैं

ख़िज़ाँ-नसीब गुलों की बहार क्या देखें

 

पुस्तकें 1

वादी-ए-ख़याल

 

1957

 

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