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जुरअत क़लंदर बख़्श

1748 - 1809 | लखनऊ, भारत

अपनी शायरी में महबूब के साथ मामला-बंदी के मज़मून के लिए मशहूर, नौजवानी में नेत्रहीन हो गए

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ऐ दिला हम हुए पाबंद-ए-ग़म-ए-यार कि तू

ऐ दिला हम हुए पाबंद-ए-ग़म-ए-यार कि तू अमानत अली ख़ान

ऐ दिला हम हुए पाबंद-ए-ग़म-ए-यार कि तू

ऐ दिला हम हुए पाबंद-ए-ग़म-ए-यार कि तू अमानत अली ख़ान

ऐ दिला हम हुए पाबंद-ए-ग़म-ए-यार कि तू

ऐ दिला हम हुए पाबंद-ए-ग़म-ए-यार कि तू जुरअत क़लंदर बख़्श

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