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कँवल डिबाइवी

1919 - 1994 | बुलंदशहर, भारत

कँवल डिबाइवी के शेर

ज़िंदगी गुम दोस्ती गुम है

ये हक़ीक़त है आदमी गुम है

हँसी में कटती थीं रातें ख़ुशी में दिन गुज़रता था

'कँवल' माज़ी का अफ़्साना तुम भूले हम भूले

ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-उक़्बा ग़म-ए-दुनिया

'कँवल' इस ज़िंदगी में ग़म के मारों को चैन आया

जिस ने बुनियाद गुलिस्ताँ की कभी डाली थी

उस को गुलशन से गुज़रने नहीं देती दुनिया

कुछ बुझी बुझी सी है अंजुमन जाने क्यूँ

ज़िंदगी में पिन्हाँ है इक चुभन जाने क्यूँ

'कँवल' ख़ुशी की हुआ करती है यूँही तकमील

ग़म-ए-हयात के हर बहर-ए-बे-कराँ से गुज़र