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करामत अली करामत

1936 | ओड़ीशा, भारत

करामत अली करामत के शेर

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हाथी के कई दाँत चबाने के लिए हैं

कुछ दाँत मगर सिर्फ़ दिखाने के लिए हैं

तुम हमें याद करो या करो

हम तुम्हें याद किए जाते हैं

अच्छा है या ख़राब नहीं इस से वास्ता

फूटा हुआ ये मेरा मुक़द्दर मुझे अज़ीज़

हमेशा आग के दरिया में इश्क़ क्यूँ उतरे

कभी तो हुस्न को ग़र्क़-ए-अज़ाब होना था

सुकून वस्ल में इतना नसीब हो कि हो

जिस इज़्तिराब से मैं इंतिज़ार करता हूँ

मैं शु'आ-ए-ज़ात के सीने में गूँजा हूँ कभी

और 'करामत' मैं कभी लम्हों के ख़्वाबों में रहा

चुभ रहा था दिल में हर दम कर रहा था बे-क़रार

इक अज़िय्यत-नाक पहलू जो मिरी राहत में था

ग़म-ए-फ़िराक़ को सीने से लग के सोने दो

शब-ए-तवील की होगी सहर कभी कभी

कोई ज़मीन है तो कोई आसमान है

हर शख़्स अपनी ज़ात में इक दास्तान है

ये अपने ही किरदार का है नतीजा

जो रब की तरफ़ से ये हम पर ग़ज़ब है

हाथ आए करामत को क्या आलम-ए-फ़ानी से

आया है बशर तन्हा जाएगा बशर ख़ाली

ग़म-ए-हस्ती भला कब मो'तबर हो

मोहब्बत में जब तक आँख तर हो

पतवार गिर गई थी समुंदर की गोद में

दिल का सफ़ीना फिर भी लहू के सफ़र में था

जो आया है उसे जाना है इक दिन

अज़ल से तो यही इक सिलसिला है

तुम काम अपना कल के लिए छोड़ते हो क्यों

देखा है किस ने कल को जो करना है कर लो आज

क्या ज़माने का ए'तिबार करूँ

अब नहीं अपना ए'तिबार मुझे

टूट कर कितनों को मजरूह ये कर सकता है

संग तू ने अभी देखा नहीं शीशे का जिगर

तुम मिरा हाल पूछते क्या हो

अब तो जिस हाल में हूँ अच्छा है

मंज़िल पे भी पहुँच के मयस्सर नहीं सकूँ

मजबूर इस क़दर हैं शुऊर-ए-सफ़र से हम

वो कौन था जो मिरी ज़िंदगी के दफ़्तर से

हुरूफ़ ले गया ख़ाली किताब छोड़ गया

वो मेरी फ़हम का लेता है इम्तिहाँ शायद

कि हर सवाल से पहले जवाब माँगे है

मैं लफ़्ज़ लफ़्ज़ में तुझ को तलाश करता हूँ

सवाल में नहीं आता जवाब में

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