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मीर अली औसत रशक

1797 - 1867 | लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 5

 

शेर 3

हद से गुज़रा जब इंतिज़ार तिरा

मौत का हम ने इंतिज़ार किया

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सुना रहा हूँ नकीरैन को फ़साना-ए-हिज्र

सवाल उन के जुदा हैं मिरे जवाब जुदा

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अब तो बातें भी हो गईं मौक़ूफ़

अरिनी है लन-तरानी है

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पुस्तकें 2

इंतिख़ाब-ए-रशक

 

1983

Nafs-ul-Lugha

Part-001

1987

 

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