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मुज़फ़्फ़र वारसी

1933 - 2011 | लाहौर, पाकिस्तान

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ज़िंदगी तुझ से हर इक साँस पे समझौता करूँ

शौक़ जीने का है मुझ को मगर इतना भी नहीं

हर शख़्स पर किया करो इतना ए'तिमाद

हर साया-दार शय को शजर मत कहा करो

कुछ कहने से भी छिन जाता है एजाज़-ए-सुख़न

ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है

लिया जो उस की निगाहों ने जाएज़ा मेरा

तो टूट टूट गया ख़ुद से राब्ता मेरा

पहले रग रग से मिरी ख़ून निचोड़ा उस ने

अब ये कहता है कि रंगत ही मिरी पीली है

जभी तो उम्र से अपनी ज़ियादा लगता हूँ

बड़ा है मुझ से कई साल तजरबा मेरा

मैं अपने घर में हूँ घर से गए हुओं की तरह

मिरे ही सामने होता है तज़्किरा मेरा

तू चले साथ तो आहट भी आए अपनी

दरमियाँ हम भी हों यूँ तुझे तन्हा चाहें

when you walk with me the echo, of my steps should not intrude

I too should not be the between us, I want you in such solitude

वा'दा मुआवज़े का करता अगर ख़ुदा

ख़ैरात भी सख़ी से मिलती फ़क़ीर को

मुझे ख़ुद अपनी तलब का नहीं है अंदाज़ा

ये काएनात भी थोड़ी है मेरे कासे में

ख़ुद मिरी आँखों से ओझल मेरी हस्ती हो गई

आईना तो साफ़ है तस्वीर धुँदली हो गई

डुबोने वालों को शर्मिंदा कर चुका हूँगा

मैं डूब कर ही सही पार उतर चुका हूँगा

साँस लेता हूँ कि पत-झड़ सी लगी है मुझ में

वक़्त से टूट रहे हैं मिरे बँधन जैसे

ज़ख़्म-ए-तन्हाई में ख़ुशबू-ए-हिना किस की थी

साया दीवार पे मेरा था सदा किस की थी