Naseer Turabi's Photo'

मक़बूल पाकिस्तानी धारावाहिक हमसफ़र के टाइटल गीत और ग़ज़ल “ वो हमसफ़र था मगर…” के प्रसिद्ध शायर

मक़बूल पाकिस्तानी धारावाहिक हमसफ़र के टाइटल गीत और ग़ज़ल “ वो हमसफ़र था मगर…” के प्रसिद्ध शायर

2.77K
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

मिलने की तरह मुझ से वो पल भर नहीं मिलता

दिल उस से मिला जिस से मुक़द्दर नहीं मिलता

कुछ रोज़ नसीर आओ चलो घर में रहा जाए

लोगों को ये शिकवा है कि घर पर नहीं मिलता

शहर में किस से सुख़न रखिए किधर को चलिए

इतनी तन्हाई तो घर में भी है घर को चलिए

अदावतें थीं, तग़ाफ़ुल था, रंजिशें थीं बहुत

बिछड़ने वाले में सब कुछ था, बेवफ़ाई थी

वो हम-सफ़र था मगर उस से हम-नवाई थी

कि धूप छाँव का आलम रहा जुदाई थी

इस कड़ी धूप में साया कर के

तू कहाँ है मुझे तन्हा कर के

ये राह-ए-तमन्ना है यहाँ देख के चलना

इस राह में सर मिलते हैं पत्थर नहीं मिलता

मैं इक शजर की तरह रह-गुज़र में ठहरा हूँ

थकन उतार के तू किस तरफ़ रवाना हुआ

आज की रात उजाले मिरे हम-साया हैं

आज की रात जो सो लूँ तो नया हो जाऊँ

ये हवा सारे चराग़ों को उड़ा ले जाएगी

रात ढलने तक यहाँ सब कुछ धुआँ हो जाएगा

तुझे क्या ख़बर मिरे बे-ख़बर मिरा सिलसिला कोई और है

जो मुझी को मुझ से बहम करे वो गुरेज़-पा कोई और है