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निदा फ़ाज़ली

1938 - 2016 | मुंबई, भारत

महत्वपूर्ण आधुनिक शायर और फ़िल्म गीतकार। अपनी ग़ज़ल ' कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता ' के लिए प्रसिध्द

महत्वपूर्ण आधुनिक शायर और फ़िल्म गीतकार। अपनी ग़ज़ल ' कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता ' के लिए प्रसिध्द

बदला न अपने-आप को जो थे वही रहे

बदला न अपने-आप को जो थे वही रहे

हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी

हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो

हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है

दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता

हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है