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परवीन फ़ना सय्यद

1936 - 2010 | रावलपिंडी, पाकिस्तान

ग़ज़ल 27

शेर 3

मेरी आँखों में उतरने वाले

डूब जाना तिरी आदत तो नहीं

तेरी पहचान के लाखों अंदाज़

सर झुकाना ही इबादत तो नहीं

खुल के रो लूँ तो ज़रा जी सँभले

मुस्कुराना ही मसर्रत तो नहीं

 

पुस्तकें 2

Harf-e-Wafa

 

1947

Tamanna Ka Doosra Qadam

 

1985

 

चित्र शायरी 1

दर्द की रात ने ये रंग भी दिखलाए हैं मेरी पलकों पे सितारे से उतर आए हैं दिल के वीराने में किस याद का झोंका गुज़रा किस ने इस रेत में ये फूल से महकाए हैं हम ने सोचा तिरी आँखें तो उठें लब तो हिलें इस लिए हम तिरी महफ़िल से चले आए हैं जिन से इंसान के ज़ख़्मों का मुदावा न हुआ आज वो चाँद सितारों की ख़बर लाए हैं चंद सिक्कों की तलब हसरत-ए-बेजा तो न थी फिर भी हम फैले हुए हाथ से घबराए हैं

 

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