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क़मर जलालवी

1887 - 1968 | कराची, पाकिस्तान

पाकिस्तान के उस्ताद शायर, कई लोकप्रिय शेरों के रचयिता।

पाकिस्तान के उस्ताद शायर, कई लोकप्रिय शेरों के रचयिता।

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ज़रा रूठ जाने पे इतनी ख़ुशामद

'क़मर' तुम बिगाड़ोगे आदत किसी की

शुक्रिया क़ब्र तक पहुँचाने वालो शुक्रिया

अब अकेले ही चले जाएँगे इस मंज़िल से हम

इस लिए आरज़ू छुपाई है

मुँह से निकली हुई पराई है

आएँ हैं वो मज़ार पे घूँघट उतार के

मुझ से नसीब अच्छे है मेरे मज़ार के

ज़ब्त करता हूँ तो घुटता है क़फ़स में मिरा दम

आह करता हूँ तो सय्याद ख़फ़ा होता है

पूछो अरक़ रुख़्सारों से रंगीनी-ए-हुस्न को बढ़ने दो

सुनते हैं कि शबनम के क़तरे फूलों को निखारा करते हैं

wipe not the droplets from your face, let beauty's lustre grow

drops of dew when flowers grace, enhance their freshness so

wipe not the droplets from your face, let beauty's lustre grow

drops of dew when flowers grace, enhance their freshness so

कभी कहा किसी से तिरे फ़साने को

जाने कैसे ख़बर हो गई ज़माने को

अब नज़अ का आलम है मुझ पर तुम अपनी मोहब्बत वापस लो

जब कश्ती डूबने लगती है तो बोझ उतारा करते हैं

my end is now upon me, take back your

for when a ship is sinking, the burden is removed

my end is now upon me, take back your

for when a ship is sinking, the burden is removed

दबा के क़ब्र में सब चल दिए दुआ सलाम

ज़रा सी देर में क्या हो गया ज़माने को

अब आगे इस में तुम्हारा भी नाम आएगा

जो हुक्म हो तो यहीं छोड़ दूँ फ़साने को

रोएँगे देख कर सब बिस्तर की हर शिकन को

वो हाल लिख चला हूँ करवट बदल बदल कर

सुरमे का तिल बना के रुख़-ए-ला-जवाब में

नुक़्ता बढ़ा रहे हो ख़ुदा की किताब में

मैं उन सब में इक इम्तियाज़ी निशाँ हूँ फ़लक पर नुमायाँ हैं जितने सितारे

'क़मर' बज़्म-ए-अंजुम की मुझ को मयस्सर सदारत नहीं है तो फिर और क्या है

मुझे मेरे मिटने का ग़म है तो ये है

तुम्हें बेवफ़ा कह रहा है ज़माना

सुना है ग़ैर की महफ़िल में तुम जाओगे

कहो तो आज सजा लूँ ग़रीब-ख़ाने को

'क़मर' ज़रा भी नहीं तुम को ख़ौफ़-ए-रुस्वाई

चले हो चाँदनी शब में उन्हें बुलाने को

'क़मर' किसी से भी दिल का इलाज हो सका

हम अपना दाग़ दिखाते रहे ज़माने को

अभी बाक़ी हैं पत्तों पर जले तिनकों की तहरीरें

ये वो तारीख़ है बिजली गिरी थी जब गुलिस्ताँ पर

जल्वा-गर बज़्म-ए-हसीनाँ में हैं वो इस शान से

चाँद जैसे 'क़मर' तारों भरी महफ़िल में है

रुस्वा करेगी देख के दुनिया मुझे 'क़मर'

इस चाँदनी में उन को बुलाने को जाए कौन

तेरे क़ुर्बान 'क़मर' मुँह सर-ए-गुलज़ार खोल

सदक़े उस चाँद सी सूरत पे हो जाए बहार

मुद्दतें हुईं अब तो जल के आशियाँ अपना

आज तक ये आलम है रौशनी से डरता हूँ

शब को मिरा जनाज़ा जाएगा यूँ निकल कर

रह जाएँगे सहर को दुश्मन भी हाथ मल कर

वो चार चाँद फ़लक को लगा चला हूँ 'क़मर'

कि मेरे बा'द सितारे कहेंगे अफ़्साने

रौशन है मेरा नाम बड़ा नामवर हूँ मैं

शाहिद हैं आसमाँ के सितारे क़मर हूँ मैं

जिगर का दाग़ छुपाओ 'क़मर' ख़ुदा के लिए

सितारे टूटते हैं उन के दीदा-ए-नम से

बढ़ा बढ़ा के जफ़ाएँ झुका ही दोगे कमर

घटा घटा के 'क़मर' को हिलाल कर दोगे

अगर जाए पहलू में 'क़मर' वो माह-ए-कामिल भी

दो आलम जगमगा उट्ठेंगे दोहरी चाँदनी होगी

यही है गर ख़ुशी तो रात भर गिनते रहो तारे

'क़मर' इस चाँदनी में उन का अब आना तो क्या होगा

नशेमन ख़ाक होने से वो सदमा दिल को पहुँचा है

कि अब हम से कोई भी रौशनी देखी नहीं जाती

नज़'अ की और भी तकलीफ़ बढ़ा दी तुम ने

कुछ बन आया तो आवाज़ सुना दी तुम ने

'क़मर' अफ़्शाँ चुनी है रुख़ पे उस ने इस सलीक़े से

सितारे आसमाँ से देखने को आए जाते हैं

ऐसे में वो हों बाग़ हो साक़ी हो 'क़मर'

लग जाएँ चार चाँद शब-ए-माहताब में

हो रिहाई क़फ़स से अगर नहीं होती

निगाह-ए-शौक़ तो बे-बाल-ओ-पर नहीं होती

शाम को आओगे तुम अच्छा अभी होती है शाम

गेसुओं को खोल दो सूरज छुपाने के लिए

'क़मर' अपने दाग़-ए-दिल की वो कहानी मैं ने छेड़ी

कि सुना किए सितारे मिरा रात भर फ़साना

हर वक़्त महवियत है यही सोचता हूँ मैं

क्यूँ बर्क़ ने जलाया मिरा आशियाँ पूछ

ख़ून होता है सहर तक मिरे अरमानों का

शाम-ए-वा'दा जो वो पाबंद-ए-हिना होता है