राजेन्द्र बहादुर माैज
अशआर 1
इश्क़ की इब्तिदा तो है इश्क़ की इंतिहा नहीं
इश्क़ है वो बक़ा सरिश्त जिस को कभी फ़ना नहीं
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere