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Ranjoor Azimabadi's Photo'

रंजूर अज़ीमाबादी

1863 - 1923 | कोलकाता, भारत

उर्दू शायरी में अज़ीमाबाद की ख़ास पहचान स्थापित करने वालों में एक अहम नाम। 'शम्सुल उलेमा' एवं 'ख़ान बहादुर' की उपाधियों से सम्मानित

उर्दू शायरी में अज़ीमाबाद की ख़ास पहचान स्थापित करने वालों में एक अहम नाम। 'शम्सुल उलेमा' एवं 'ख़ान बहादुर' की उपाधियों से सम्मानित

रंजूर अज़ीमाबादी के शेर

मुझ को काफ़ी है बस इक तेरा मुआफ़िक़ होना

सारी दुनिया भी मुख़ालिफ़ हो तो क्या होता है

इल्म हासिल कर के भी मिलती नहीं है नौकरी

रहम के क़ाबिल है बस हालत हमारी इन दिनों

बुतों में किस बला की है कशिश अल्लाह ही जाने

चले थे शौक़-ए-काबा में सनम-ख़ाने में जा निकले

दिखा कर ज़हर की शीशी कहा 'रंजूर' से उस ने

अजब क्या तेरी बीमारी की ये हकमी दवा निकले

अगर चिलमन के बाहर वो बुत-ए-काफ़िर-अदा निकले

ज़बान-ए-शैख़ से सल्ले-अला सल्ले-अला निकले

हुईं आज़ाद क़ैद-ए-शरअ' से तालीम के सदक़े

पकड़ कर दस्त-ए-ना-महरम क्यूँ उतरें वो टमटम से

देता है मुझ को चर्ख़-ए-कुहन बार बार दाग़

उफ़ एक मेरा सीना है उस पर हज़ार दाग़

ग़रज़ कि वक़्तों में हम ने अक्सर लगाई है मुस्लिमों से यारी

मगर ग़रज़ जब रही बाक़ी तो उन से नाहक़ उलझ पड़े हैं

होता है साफ़ रू-ए-किताबी से ये अयाँ

काफ़िर है गो वो बुत मगर अहल-ए-किताब है

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