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सनाउल्लाह फ़िराक़

1753/54 - 1826/31 | दिल्ली, भारत

शेर 2

उँगलियाँ घिस गईं याँ हाथों को मलते मलते

लेकिन अफ़्सोस नविश्ता मिटा क़िस्मत का

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दिल थामता कि चश्म पे करता तिरी निगाह

साग़र को देखता कि मैं शीशा सँभालता

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