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शाहिद माहुली

1943 | दिल्ली, भारत

रंग बे-रंग हुआ डूब गईं आवाज़ें

रेत ही रेत है अब लाश उठाई जाए

फैला हुआ है जिस्म में तन्हाइयों का ज़हर

रग रग में जैसे सारी उदासी उतर गई

ख़ूँ का सैलाब था जो सर से अभी गुज़रा है

बाम-ओ-दर अब भी सिसकते हैं मगर घर चुप हैं