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शौक़ असर रामपुरी

रामपुर, भारत

शौक़ असर रामपुरी के शेर

अभी फ़र्क़ है आदमी आदमी में

अभी दूर है आदमी आदमी से

मिरे ख़याल की वुसअत में हैं हज़ार चमन

कहाँ कहाँ से निकालेगी ये बहार मुझे

वो ग़म हो या अलम हो दर्द हो या आलम-ए-वहशत

उसे अपना समझ ज़िंदगी जो तेरे काम आए

शगुफ़्ता फूल जो देखे तो 'शौक़' याद आया

दिए थे दाग़ भी गुलशन ने बे-शुमार मुझे

बता नसीब-ए-नशेमन मैं क्या दुआ माँगूँ

जो आसमाँ की तरफ़ रौशनी नज़र आए

मातम-ए-मर्ग-ए-तमन्ना समझ नादाँ

ज़िंदगी बोल रही है मिरे अफ़्साने में

आज तक दैर-ओ-हरम में तेग़ ही चलती रही

लाख हम-रिंदों ने चाहा शीशा-ओ-साग़र चलें