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सिरज आलम ज़ख़मी

1984 | सउदी अरब

सिरज आलम ज़ख़मी

ग़ज़ल 5

 

अशआर 11

कोई शिकवा कोई गिला दे दे

मुझ को जीने का हौसला दे दे

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बेवफ़ाई का मुझे इल्ज़ाम देता था वो शख़्स

मैं ने भी इतना किया बस उस को सच्चा कर दिया

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ख़ुद को बचाऊँ जिस्म सँभालूँ कि रूह को

बिखरा हुआ है दर्द यहाँ से वहाँ तलक

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इतना दूर जाओ कि जीना मुहाल हो

यूँ भी पास आओ कि दम ही निकल पड़े

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दिल में तूफ़ान नहीं आँख में सैलाब नहीं

ऐसे जीने से तो बेहतर था कि मर ही जाते

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पुस्तकें 1

 

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