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सिराज लखनवी

1894 - 1968 | लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 30

शेर 55

आँखें खुलीं तो जाग उठीं हसरतें तमाम

उस को भी खो दिया जिसे पाया था ख़्वाब में

as my eyes did ope my yearnings did rebound

for I lost the person who in my dreams I found

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आप के पाँव के नीचे दिल है

इक ज़रा आप को ज़हमत होगी

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कहाँ हैं आज वो शम-ए-वतन के परवाने

बने हैं आज हक़ीक़त उन्हीं के अफ़्साने

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हाँ तुम को भूल जाने की कोशिश करेंगे हम

तुम से भी हो सके तो आना ख़याल में

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ये आधी रात ये काफ़िर अंधेरा

सोता हूँ जागा जा रहा है

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पुस्तकें 2

शोला-ए-आवाज़

 

1920

Shola-e-Awaz

 

1960

 

चित्र शायरी 3

आप के पाँव के नीचे दिल है इक ज़रा आप को ज़हमत होगी

आँखें खुलीं तो जाग उठीं हसरतें तमाम उस को भी खो दिया जिसे पाया था ख़्वाब में

आँखें खुलीं तो जाग उठीं हसरतें तमाम उस को भी खो दिया जिसे पाया था ख़्वाब में

 

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