Syeda Nafis Bano shama's Photo'

सय्यदा नफ़ीस बानो शम्अ

1957 | दिल्ली, भारत

बहुत ग़ुरूर था बिफरे हुए समुंदर को

मगर जो देखा मिरे आँसुओं से कम-तर था

खिड़कियाँ खोल लूँ हर शाम यूँही सोचों की

फिर उसी राह से यादों को गुज़रता देखूँ

ख़्वाब और नींदों का ख़त्म हो गया रिश्ता

मुद्दतों से आँखों में रत-जगों का मौसम है

मेहर-ओ-वफ़ा ख़ुलूस-ए-तमन्ना मिलन की आस

कुछ कम नहीं कि हम ने ये मोती बचा लिए