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मीर तस्कीन देहलवी

1803 - 1851

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जिस वक़्त नज़र पड़ती है उस शोख़ पे 'तस्कीं'

क्या कहिए कि जी में मेरे क्या क्या नहीं होता

क़ासिद आया है वहाँ से तू ज़रा थम तो सही

बात तो करने दे उस से दिल-ए-बेताब मुझे

शब-ए-विसाल में सुनना पड़ा फ़साना-ए-ग़ैर

समझते काश वो अपना राज़दार मुझे

इतनी कीजे जाने की जल्दी शब-ए-विसाल

देखे हैं मैं ने काम बिगड़ते शिताब में

'तस्कीन' करूँ क्या दिल-ए-मुज़्तर का इलाज अब

कम-बख़्त को मर कर भी तो आराम आया

करता हूँ तेरी ज़ुल्फ़ से दिल का मुबादला

हर-चंद जानता हूँ ये सौदा बुरा नहीं

ज़ब्त करता हूँ वले इस पर भी है ये जोश-ए-अश्क

गिर पड़ा जो आँख से क़तरा वो दरिया हो गया

पूछे जो तुझ से कोई कि 'तस्कीं' से क्यूँ मिला

कह दीजो हाल देख के रहम गया मुझे

अभी इस राह से कोई गया है

कहे देती है शोख़ी नक़्श-ए-पा की

'तस्कीं' ने नाम ले के तिरा वक़्त-ए-मर्ग आह

क्या जाने क्या कहा था किसी ने सुना नहीं

कहे देती हैं ये नीची निगाहें

कि बाला-ए-ज़मीं क्या क्या होगा