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याक़ूब आमिर

ग़ज़ल 7

शेर 10

बाद-ए-नफ़रत फिर मोहब्बत को ज़बाँ दरकार है

फिर अज़ीज़-ए-जाँ वही उर्दू ज़बाँ होने लगी

सच कहियो कि वाक़िफ़ हो मिरे हाल से 'आमिर'

दुनिया है ख़फ़ा मुझ से कि दुनिया से ख़फ़ा मैं

मुझे भी ख़ुद था एहसास अपने होने का

तिरी निगाह में अपना मक़ाम खोने तक

हर नया रस्ता निकलता है जो मंज़िल के लिए

हम से कहता है पुरानी रहगुज़र कुछ भी नहीं

सर के नीचे ईंट रख कर उम्र भर सोया है तू

आख़िरी बिस्तर भी 'आमिर' तेरा फ़र्श-ए-ख़ाक था

पुस्तकें 7

Aasmani Khutoot

 

1983

Chalo Chand Par Chalen

 

1987

दस्त-ए-नारसा

 

1984

Raqs-e-Khayal

 

1986

Sabza-e-Guftar

 

1980

Shola-e-Khas Posh

 

1987

Urdu Ke Adabi Maarke

 

2002

Urdu Ke Ibtidai Adabi Marke

 

1992